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शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

hasya salila: neebu -sanjiv

हास्य सलिला;
नीबू
संजीव
*
फरमाइश मेहमान की सुन लाली हैरान
लालू पूछे: 'समस्या क्या है मेरी जान?
पल में हल कर दूँ कहो, फिर करें दो प्यार'
लाली बिगड़ीं: 'हटो जी! बिगड़ेगा सिंगार
नीबू घर में है नहीं, रहे शिकंजी माँग
लाओ नीबू या नहीं व्यर्थ अड़ाओ टांग'
लालू मुस्काये कहा: 'चिंता है बेकार
सौ नीबू की शक्ति ले आया न्यू विम बार
दो बूँदें दो डाल फिर करो शिकंजी पेश'
लाली खीझीं: 'नोच दूँ आज तुम्हारे केश'
*

chhand salila: shashivadna chhand -sanjiv

छंद सलिला:

शशिवदना छंद
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, एकावली, कीर्ति, घनाक्षरी, छवि, तांडव, तोमर, दीप, दोधक, निधि, प्रेमा, मधुभार ,माला, लीला, वाणी, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शिव, शुभगति, सार, सुगति, सुजान, हंसी)
*संजीव
*
यह दस मात्रिक छंद है.

उदाहरण:

१. शशिवदना चपला
   कमलाक्षी अचला
   मृगनयनी मुखरा  
   मीनाक्षी मृदुला

२. कर्मदा वर्मदा धर्मदा नर्मदा
   शर्मदा मर्मदा हर्म्यदा नर्मदा
   शक्तिदा भक्तिदा मुक्तिदा नर्मदा
   गीतदा प्रीतदा मीतदा नर्मदा

३. गुनगुनाना सदा
   मुस्कुराना सदा
   झिलमिलाना सदा
   खिलखिलाना सदा
   गीत गाना सदा
   प्रीत पाना सदा
   मुश्किलों को 'सलिल'
   जीत जाना सदा

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गुरुवार, 30 जनवरी 2014

chhand salila: ekawali chhand -sanjiv

छंद सलिला:   
एकावली छंद
संजीव
*
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, एकावली, कीर्ति, घनाक्षरी, छवि, तांडव, तोमर, दीप, दोधक, निधि, प्रेमा, मधुभार ,माला, लीला, वाणी, शक्तिपूजा, शाला, शिव, शुभगति, सार, सुगति, सुजान, हंसी)
*
दस मात्रिक एकावली छंद के हर चरण में ५-५ मात्राओं पर यति होती है.

उदाहरण :

१. नहीं सर झुकाना, नहीं पथ भुलाना
   गिरे को  उठाना, गले से लगाना
   न तन को सजाना, न मन को भुलाना
   न खुद को लुभाना, न धन ही जुटाना

२. हरि भजन कीजिए, नित नमन कीजिए
    निज वतन पूजिए, फ़र्ज़ मत भूलिए
    मरुथली भूमियों को,  चमन कीजिए
   भाव से भीगिए, भक्ति पर रीझिए

३. कर प्रीत, गढ़ रीत / लें जीत मन मीत
    नव गीत नव नीत, मन हार मन जीत
 
    **********

बुधवार, 29 जनवरी 2014

chhand salila: leela chhand -sanjiv

छंद सलिला:   
लीला छंद
संजीव
*
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, छवि, तांडव, तोमर, दीप, दोधक, निधि, प्रेमा, मधुभार,माला, लीला, वाणी, शक्तिपूजा, शाला, शिव, शुभगति, सार, सुगति, सुजान, हंसी)
 लीला द्वादश मात्रिक छंद है. इसमें चरणान्त में जगण होता है. 
उदाहरण:
१. लीला किसकी पुनीत, गत-आगत-आज मीत 
   बारह आदित्य  प्रीत,करें धरा से अभीत 
   लघु-गुरु-लघु दिग्दिगंत, जन्म-मृत्यु-जन्म तंत 
   जग गण जनतंत्र-कंत, शासक हो 'सलिल' संत 
२. चाहा था लोक तंत्र, पाया है लोभ तंत्र
   नष्ट करो कोक तंत्र, हों न कहीं शोक तंत्र 
   जन-हित मत रोक तंत्र, है कुतंत्र हो सुतंत्र 
   जन-हित जब बने मंत्र, तब ही हो प्रजा तंत्र
   ---------------

chhand salila: tandav chhand -sanjiv

छंद सलिला :
ताण्डव छंद
संजीव
*
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, छवि, ताण्डव, तोमर, दीप, दोधक, निधि, प्रेमा, मधुभार,माला, वाणी, शक्तिपूजा, शाला, शिव, शुभगति, सार, सुगति, सुजान, हंसी)
तांडव रौद्र कुल का बारह मात्रीय छंद है जिसके हर चरण के आदि-अंत में लघु वर्ण अनिवार्य है.

उदाहरण:

१. भर जाता भव में रव, शिव करते जब ताण्डव
   शिवा रहित शिव हों शव, आदि -अंत लघु अभिनव
   बारह आदित्य मॉस राशि वर्ण 'सलिल' खास
   अधरों पर रखें हास, अनथक करिए प्रयास

२. नाश करें प्रलयंकर, भय हरते अभ्यंकर
   बसते कंकर शंकर, जगत्पिता बाधा हर
   महादेव हर हर हर, नाश-सृजन अविनश्वर 
   त्रिपुरारी उमानाथ, 'सलिल' सके अब भव तर

३. जग चाहे रहे वाम, कठिनाई सह तमाम
   कभी नहीं करें डाह, कभी नहीं भरें आह
   मन न तजे कभी चाह, तन न तजे तनिक राह
   जी भरकर करें काम, तभी भला करें राम

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मंगलवार, 28 जनवरी 2014

chhand salila: madhubhar chhand -sanjiv



छंद सलिला:
छंद सलिला:   
मधुभार छंद
संजीव
*
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, छवि, तोमर, दीप, दोधक, निधि, प्रेमा, मधुभार,माला, वाणी, शक्तिपूजा, शाला, शिव, शुभगति, सार, सुगति, सुजान, हंसी)
मधुभार अष्टमात्रिक छंद है. इसमें ३ -५ मात्राओं पर यति और चरणान्त में जगण होता है. 
उदाहरण:
१. सहे मधुभार / सुमन गह सार 
   त्रिदल अरु पाँच / अष्ट छवि साँच
२. सुनो न हिडिम्ब / चलो अविलंब 
   बनो मत खंब / सदय अब अंब
   -----

सोमवार, 27 जनवरी 2014

muktak: sanjiv

Sanjiv Verma 'salil'  
*
मुक्तक:
अंधेरों को चीरकर तुमकोउजाला मिलेगा 
सत्य-शिव-सुंदर वरो, मन में शिवाला मिलेगा 
सूर्य सी मेहनत करो बिन दाम सुबहो-शाम तुम-
तभी तो अमरत्व का तुमको निवाला मिलेगा 

andheron ko cheerkar nikalo uajala milega / 
satya shiv sundar varo man men shivala milega / 
surya si mehnat karo bin daam subho-shaam tum
tabhee amaratva ka tumako nivala milega.
*
बिटिया बोले तो बचपन को याद करो 
जब चुप तो खुद से ही संवाद करो
जब नाचे तो झूम उठो आनंद मना 
कभी न रोए प्रभु से यह फरियाद करो 

bitiya bole to bachpan ko yad karo / 
jab chup ho to khud se hee samvad karo / 
jab nache to jhoom utho anand mana / 
kabhee n roye prabhu se yah fariyaad karo.
*
नये हाथों को सहारा दें सदा
शुक्रिया मिलकर खुदा का हो अदा
नईं राहों पर चलें जो पग नये
मंज़िलें होंगी 'सलिल' उन पर फ़िदा

naye hathon ko sahara den sda/
shukriya milkar khuda ka ho ada/
nyi rahon par chale jo pag nye/
manzilen hongi 'salil' un par fida

*
salil.sanjiv@gmail.com / divyanarmada.blogspot.in

रविवार, 26 जनवरी 2014

kriti charcha: khamma ashok jamnani -sanjiv

कृति चर्चा: 
मरुभूमि के लोकजीवन की जीवंत गाथा "खम्मा"
चर्चाकार: संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[कृति विवरण: खम्मा, उपन्यास, अशोक जमनानी, आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी सजिल्द, पृष्ठ १३७, मूल्य ३०० रु., श्री रंग प्रकाशन होशंगाबाद]  
*
                राजस्थान की मरुभूमि से सन्नाटे को चीरकर दिगंत तक लोकजीवन की अनुभूतियों को अपने हृदवेधी स्वरों से पहुँचाते माँगणियारों के संघर्ष, लुप्त होती विरासत को बचाये रखने की जिजीविषा, छले जाने के बाद भी न छलने का जीवट जैसे  जीवनमूल्यों पर केंद्रित "खम्मा" युवा तथा चर्चित उपन्यासकार अशोक जमनानी की पाँचवी कृति है. को अहम्, बूढ़ी डायरी, व्यासगादी तथा छपाक से हिंदी साहत्य जगत में परिचित ही नहीं प्रतिष्ठित भी हो चुके अशोक जमनानी खम्मा में माँगणियार बींझा के आत्म सम्मान, कलाप्रेम, अनगढ़ प्रतिभा, भटकाव, कलाकारों के पारस्परिक लगाव-सहयोग, तथाकथित सभ्य पर्यटकों द्वारा शोषण, पारिवारिक ताने-बाने और जमीन के प्रति समर्पण की सनातनता को शब्दांकित कर सके हैं. 

                "जो कलाकार की बनी लुगाई, उसने पूरी उम्र अकेले बिताई" जैसे संवाद के माध्यम से कथा-प्रवाह को संकेतित करता उपन्यासकार ढोला-मारू की धरती में अन्तर्व्याप्त कमायचे और खड़ताल के मंद्र सप्तकी स्वरों के साथ 'घणी खम्मा हुकुम' की परंपरा के आगे सर झुकाने से इंकार कर सर उठाकर जीने की ललक पालनेवाले कथानायक बींझा की तड़प का साक्षी बनता-बनाता है. 

अकथ कहानी प्रेम की, किणसूं कही न जाय 
गूंगा को सुपना भया, सुमर-सुमर पछताय 

                मोहब्बत की अकथ कहानी को शब्दों में पिरोते अशोक, राहुल सांकृत्यायन और विजय दान देथा के पाठकों गाम्भीर्य और गहनता की दुनिया से गति और विस्तार के आयाम में ले जाते हैं. उपन्यास के कथासूत्र में काव्य पंक्तियाँ गेंदे के हार में गुलाब पुष्पों की तरह गूँथी गयी हैं. 

                बेकलू (विकल रेत) की तरह अपने वज़ूद की वज़ह तलाशता बींझा अपने मित्र सूरज और अपनी  संघर्षरत सुरंगी का सहारा पाकर अपने मधुर गायन से पर्यटकों को रिझाकर आजीविका कमाने की राह पर चल पड़ता है. पर्यटकों के साथ धन के सामानांतर उन्मुक्त अमर्यादित जीवनमूल्यों के तूफ़ान (क्रिस्टीना के मोहपाश में) बींझा का फँसना, क्रिस्टीना का अपने पति-बच्चों के पास लौटना, भींजा की पत्नी सोरठ द्वारा कुछ न कहेजाने पर भी बींझा की भटकन को जान जाना और उसे अनदेखा करते हुए भी क्षमा न कर कहना " आपने इन दिनों मुझे मारा नहीं पर घाव देते रहे… अब मेरी रूह सूख गयी है…  आप कुछ भी कहो लेकिन मैं आपको माफ़ नहीं कर पा रही हूँ… क्यों माफ़ करूँ आपको?' यह स्वर नगरीय स्त्री विमर्श की मरीचिका से दूर ग्रामीण भारत के उस नारी का है जो अपने परिवार की धुरी है. इस सचेत नारी को पति द्वारा पीटेजाने पर भी उसके प्यार की अनुभूति होती है, उसे शिकायत तब होती है जब पति उसकी अनदेखी कर अन्य स्त्री के बाहुपाश में जाता है. तब भी वह अपने कर्तव्य की अनदेखी नहीं करती और गृहस्वामिनी बनी रहकर अंततः पति को अपने निकट आने के लिये विवश कर पाती है. 

                उपन्यास के घटनाक्रम में परिवेशानुसार राजस्थानी शब्दों, मुहावरों, उद्धरणों और काव्यांशों का बखूबी प्रयोग कथावस्तु को रोचकता ही नहीं पूर्णता भी प्रदान करता है किन्तु बींझा-सोरठ संवादों की शैली, लहजा और शब्द देशज न होकर शहरी होना खटकता है. सम्भवतः ऐसा पाठकों की सुविधा हेतु किया गया हो किन्तु इससे प्रसंगों की जीवंतता और स्वाभाविकता प्रभावित हुई है. 

                कथांत में सुखांती चलचित्र की तरह हुकुम का अपनी साली से विवाह, उनके बेटे सुरह का प्रेमिका प्राची की मृत्यु को भुलाकर प्रतीची से जुड़ना और बींझा को विदेश यात्रा  का सुयोग पा जाना 'शो मस्त गो ऑन' या 'जीवन चलने का नाम' की उक्ति अनुसार तो ठीक है किन्तु पारम्परिक भारतीय जीवन मूल्यों के विपरीत है. विवाहयोग्य पुत्र के विवाह के पूर्व हुकुम द्वारा साली से विवाह अस्वाभाविक प्रतीत होता है. 

                सारतः, कथावस्तु, शिल्प, भाषा, शैली, कहन और चरित्र-चित्रण के निकष पर अशोक जमनानी की यह कृति पाठक को बाँधती है. राजस्थानी परिवेश और संस्कृति से अनभिज्ञ पाठक के लिये यह कृति औत्सुक्य का द्वार खोलती है तो जानकार के लिये स्मृतियों का दरीचा.... यह उपन्यास पाठक में अशोक के अगले उपन्यास की प्रतीक्षा करने का भाव भी जगाता है. 
******** 
- salil.sanjiv@gmail.com / divyanarmada.blogspot.in / 94251 83244 -

chhand salila: shiv chhand -sanjiv


छंद सलिला:
शिव छंद
संजीव
*
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, छवि, तोमर, दीप, दोधक, निधि, प्रेमा, माला, वाणी, शक्तिपूजा, शाला, शिव, शुभगति, सार, सुगति, सुजान, हंसी)
*
एकादश रुद्रों के आधार पर ग्यारह मात्राओं के छन्दों को 'रूद्र' परिवार का छंद कहा गया है. शिव छंद भी रूद्र परिवार का छंद है जिसमें ११ मात्राएँ होती हैं. तीसरी, छठंवीं तथा नवमी मात्रा लघु होना आवश्यक है. शिव छंद की मात्रा बाँट ३-३-३-३-२ होती है.
छोटे-छोटे चरण तथा दो चरणों की समान तुक शिव छंद को गति तथा लालित्य से समृद्ध करती है. शिखरिणी की सलिल धर की तरंगों के सतत प्रवाह और नरंतर आघात की सी प्रतीति कराना शिव छंद का वैशिष्ट्य है.
शिव छंद में अनिवार्य तीसरी, छठंवीं तथा नवमी लघु मात्रा के पहले या बाद में २-२ मात्राएँ होती हैं. ये एक गुरु या दो लघु हो सकती हैं. नवमी मात्रा के साथ चरणान्त में दो लघु जुड़ने पर नगण, एक गुरु जुड़ने पर आठवीं मात्र लघु होने पर सगण तथा गुरु होने पर रगण होता है.
सामान्यतः दो पंक्तियों के शिव छंद की हर एक पंक्ति में २ चरण होते हैं तथा दो पंक्तियों में चरण साम्यता आवश्यक नहीं होती। अतः छंद के चार चरणों में लघु, गुरु, लघु-गुरु या गुरु-लघु के आधार पर ४ उपभेद हो सकते हैं.
उदाहरण:
१. चरणान्त लघु:
   हम कहीं रहें सनम, हो कभी न आँख नम
   दूरियाँ न कर सकें, दूर- हों समीप हम
२. चरणान्त गुरु:
   आप साथ हों सदा, मोहती रहे अदा
   एक मैं नहीं रहूँ, भाग्य भी रहे फ़िदा
३. चरणान्त लघु-गुरु:
   शिव-शिवा रहें सदय, जग तभी रहे अभय
   पूत भक्ति भावना, पूर्ण शक्ति कामना
४. चरणान्त गुरु लघु:
   हाथ-हाथ में लिये, बाँध मुष्टि लब सिये
   उन्नत सर-माथ रख, चाह-राह निज परख
                  ------ 
facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil'

शनिवार, 25 जनवरी 2014

gantantra divas -sanjiv

ध्वजा तिरंगी...

संजीव 'सलिल'
*
ध्वजा तिरंगी मात्र न झंडा
जन गण का अभिमान है.
कभी न किंचित झुकने देंगे,
बस इतना अरमान है...
*
वीर शहीदों के वारिस हम,
जान हथेली पर लेकर
बलिदानों का पन्थ गहेंगे,
राष्ट्र-शत्रु की बलि देकर.
सारे जग को दिखला देंगे
भारत देश महान है...
*
रिश्वत-दुराचार दानव को,
अनुशासन से मारेंगे.
पौधारोपण, जल-संरक्षण,
जीवन नया निखारेंगे.
श्रम-कौशल को मिले प्रतिष्ठा,
कण-कण में भगवान है...
*
हिंदी ही होगी जग-वाणी,
यह अपना संकल्प है.
'सलिल' योग्यता अवसर पाए,
दूजा नहीं विकल्प है.
सारी दुनिया कहे हर्ष से,
भारत स्वर्ग समान है...
****

shbh gantantra divas




भारत को कहते थे


भारत को कहते थे
सोने की चिड़िया
सुख चैन से रहते थे।


गोरों को भाया था
माता का आँचल
वो लूटने आया था


हमें याद हो कुर्बानी
वीरों की गाथा
वो जोश भरी बानी।


कैसी आजादी थी
भू का बँटवारा
माँ की बर्बादी थी।


सरहद पे रहते हैं
उनका दुख पूछो
वो क्या क्या सहते हैं।


घर की तो याद आती
प्रेम भरी पाती
उन तक न पहुँच पाती।


बतलाऊँ कैसे मैं
सबकी चिंता है
घर आऊँ कैसे मैं?


हैं घात भरी रातें
बैरी करते हैं
गोली की बरसातें।


आजादी मन भाये
कितनी बहनों के
पति लौट नहीं पाये।

१०
ये प्रेम भरी बोली
दुश्मन क्या जाने
खेले खूनी होली

-शशि पुरवार

शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

chhand salila: tomar chhand -sanjiv

छंद सलिला:
बारहमात्रीय छंद
संजीव
*

(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रा वज्रा, उपेन्द्र वज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी,
छवि, तोमर, दीप, दोधक, निधि, प्रेमा, माला, वाणी, शक्तिपूजा, शाला, शुभगति, सार, सुगति, सुजान, हंसी)
*
बारह मात्रीय छंदों के २३३ भेद या प्रकार हैं जिनमें से तोमर, तांडव, लीला तथा नित अधिक लोकप्रिय हैं.

*
तोमर छंद
बारह मात्रा, अंत में गुरु लघु 
बारह सुमात्रिक छंद, तोमर सृजे आनंद 
गुरु-लघु रखे पद-अंत, सुर-नर पुजित ज्यों संत 
आदित्य बारह मास, हरकर तिमिर संत्रास  
भू को बना दे स्वर्ग, ईर्ष्या करे सुर वर्ग 
कलकल बहे जल धार, हर श्रांति-क्लांति अपार 
कलरव करें खगवृंद, रवि-रश्मि ताप अमंद 
सहयोग सुख सद्भाव, का हो न तनिक अभाव
हो लोक सेवक तंत्र, जनतंत्र का यह मंत्र
****
सalil.sanjiv@

गुरुवार, 23 जनवरी 2014

hasya salila: pyaar -sanjiv

हास्य सलिला:
प्यार
संजीव
*
चौराहे पर खड़े हुए थे लालू हो ग़मगीन
कालू पूछे: 'का हुआ?, काहे लागत दीन??
' का बतलाऊँ टिहरी भउजी का परताप?
चाह करूँ वरदान की, बे देतीं अभिशाप'
'वर तुम, वधु बे किस तरह फिर देंगी वरदान?
बतलाओ कहे किया भउजी का गुणगान?'
लालू बोले: 'रूप का मैंने किया बखान'
फिर बोला: 'प्रिय! प्यार का प्यासा हूँ मैं कhoob.'
मेरे मुँह पर डालकर पानी बोलीं: 'डूब"
'दांत निपोर मजाक कह लेते तुम आनंद
निकट न आ ठेंगा दिखा बे करती हैं तंग'

               -----------------------------

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

chhand salila: deep chhand -salil



छंद सलिला:
दस मात्रिक दैशिक छंद:
संजीव
*
दस दिशाओं के आधार पर दस मात्रिक छंदों को दैशिक छंद कहा जाता है. विविध मात्रा बाँट से ८९ प्रकार के दैशिक छंद रचे जा सकते हैं.

(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रा वज्रा, उपेन्द्र वज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी,
छवि, दीप, दोधक, निधि) प्रेमा, माला, वाणी, शक्तिपूजा, शाला, सार, सुगति/शुभगति, सुजान, हंसी, 
दस मात्रिक दीप छंद

*
दस मात्रक दीप छंद के चरणान्त में ३ लघु १ गुरु १ लघु अर्थात एक नगण गुरु-लघु या लघु सगण लघु या २ लघु १ जगण की मात्रा बाँट होती है.
उदाहरण:
१. दीप दस नित बाल, दे कुचल तम-व्याल
   स्वप्न नित नव पाल, ले 'सलिल' करताल
   हो न तनिक मलाल, विनत रख निज भाल
   दे विकल पल टाल, ले पहन कर-माल

२. हो सड़क-पग-धूल, नाव-नद-नभ कूल
   साथ रख हर बार, जीत- पर मत हार
   अनवरत बढ़ यार, आस कर पतवार
   रख सुदृढ़ निज मूल, फहर नभ पर झूल

३. जहाँ खरपतवार, करो जड़ पर वार
   खड़ी फसल निहार, लुटा जग पर प्यार
   धरा-गगन बहार, सलामत सरकार
   हुआ सजन निसार, भुलाकर सब रार
   ===========================                    
  
 

सोमवार, 20 जनवरी 2014

shatpadi: sanjiv

​​
षट्पदी :
संजीव 
*
सु मन कु मन से दूर रह, रचता मनहर काव्य
झाड़ू मन हर कर कहे,  निर्मलता संभाव्य
निर्मलता संभाव्य, सुमन से बगिया शोभित
पा सुगंध सब जग, होता है बरबस मोहित
कहे 'सलिल' श्रम सीकर से जो करे आचमन
उसकी जीवन बगिया में हों सुमन ही सुमन
*

आशा बिन सूना लगे, सलिल सभी संसार
जो निराश वह कह रहा, है संसार असार
शक-सेना को हराकर, खुद पर कर विश्वास
सक्सेना की पूर्ण हो, कोशिश से हर आस
स्वागत करती नेह-नर्मदा नित प्रवाहित हो
कविता सार्थक तभी लिखी जब सबके हित हो।

facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil' 

chhand salila: sugati / shubhgati chhand -sanjiv

छंद सलिला:
सुगति (शुभगति) छंद
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रा वज्रा, उपेन्द्र वज्रा, कीर्ति, गंग, घनाक्षरी, छवि, दोधक, निधि) प्रेमा, माला, माहिया, वाणी, शक्तिपूजा, शाला, सार, सुजान, हंसी,
संजीव 
*
सुगति सप्त मात्रिक छंद है. इसके हर चरण में सात मात्राएँ तथा चरणान्त में गुरु मात्रा का विधान होता है. 
सात मात्रा, गुरु पदांती। छंद खुश हो, मीत रचिए।  
सप्त मात्रिक  छंद के २१ भेद हो सकते हैं किन्तु अंत में एक गुरु मात्रा अचल करने पर शेष ५ मात्राओं के विविध संयोजनों से ८ छंद भेद हो सकते हैं जिनकी मात्रा बाँट १. १११११२, २. २१११२, ३. १२११२, ४. ११२१२, ५. १११२२, ६. २१२२, ७. १२२२ तथा ८. २२१२ होती है. इन ८ छंद भेदों को विविध पदों में समायोजित करने से अनेक उप भेद बन सकते हैं.  
उदाहरण :
१. हौसलों की राजधानी। नेह की हो बागवानी।।
   मिल कहेंगे नित कहानी। कुछ नयी हों कुछ पुरानी।। 
   भाइयों की निगहबानी। ज़िंदगानी है सुहानी।। 
२. तज बहाना, मन लगाना। सफल होना, लक्ष्य पाना।। 
   जो मिला है, हँस लुटाना। मुस्कुराना, खिलखिलाना।।
३. कवि कहेगी तभी जगती। बात हो जब ह्रदय चुभती। 
   सत्य झूठा, झूठ सच्चा। सियासत विश्वास ठगती।।
   ******
  
     

शनिवार, 18 जनवरी 2014

muktak: bharat -sanjiv

मुक्तक:
भारत
संजीव 'सलिल'
*
तम हरकर प्रकाश पा-देने में जो रत है.
दंडित उद्दंडों को कर, सज्जन हित नत है..
सत-शिव सुंदर, सत-चित आनंद जीवन दर्शन-
जिसका जग में देश वही अपना भारत है..
*
भारत को भाता है, जीवन का पथ सच्चा.
नहीं सुहाता देना-पाना धोखा-गच्चा..
धीर-वीर गंभीर रहे आदर्श हमारे-
पाक नासमझ समझ रहा है नाहक कच्चा..
*
भारत नहीं झुका है, भारत नहीं झुकेगा.
भारत नहीं रुका है, भारत नहीं रुकेगा..
हम-आप मेहनती हों, हम-आप नेक हों तो-
भारत नहीं चुका है, भारत नहीं चुकेगा..
*
हम भारती के बेटे, सौभाग्य हमारा है.
गिरकर उठे तोमाँने हँस-हँसकर दुलारा है..
किस्मत की कैद हमको किंचित नहीं गवारा-
अवसर ने द्वार पर आ हमको ही पुकारा है..
*
हमने जग को दिखलाया कंकर में शंकर.
मानवता के शत्रु हेतु हम हैं प्रलयंकर..
पीड़ित, दीन, दुखी मानवता के हैं रक्षक-
सज्जन संत जनों को हम ही हैं अभ्यंकर..
******

गुरुवार, 16 जनवरी 2014

chhand salila: nidhi chhand -sanjiv


छंद सलिला:
निधि छंद
संजीव
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रा वज्रा, उपेन्द्र वज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, प्रेमा, वाणी, शक्तिपूजा, सार, माला, शाला, हंसी, दोधक, सुजान, छवि, निधि)

*
निधि नौ मात्रिक छंद है जिसमें चरणान्त में लघु मात्रा होती है. पद (पंक्ति) में चरण संख्या एक या अधिक हो सकती है.
उदाहरण :
१. तजिए न नौ निधि
   भजिए किसी विधि
   चुप मन लगाकर-
   गहिए 'सलिल' सिधि
२. रहें दैव सदय, करें कष्ट विलय
   मिले आज अमिय, बहे सलिल मलय
   मिटें असुर अजय, रहें मनुज अभय
   रचें छंद मधुर, मिटे सब अविनय
३. आओ विनायक!, हर सिद्धि दायक
   करदो कृपा अब, हर लो विपद सब
   सुख-चैन दाता, मोदक ग्रहणकर
   खुश हो विधाता, हर लो अनय अब
   ====================

hasya salila: chaay-coffee -sanjiv


हास्य सलिला:
चाय-कॉफी
संजीव
*
लाली का आदेश था: 'जल्दी लाओ कॉफ़ी
देर हुई तो नहीं मिलेगी ए लालू जी! माफ़ी'
लालू बोले: 'मैडम! हमको है तुमरी परवाह
का बतलायें अधिक सोनिया जी से तुमरी चाह
चाय बनायी गरम-गरम पी लें, होगा आभार'
लाली डपटे: 'तनिक नहीं है तुममें अक्कल यार
चाय पिला मोड़ों-मोड़िन को, कॉफी तुरत बनाओ
कहे दुर्गत करवाते हो? अपनी जान बचाओ
लोटा भर भी पियो मगर चैया होती नाकाफ़ी
चम्मच भर भी मिले मगर कॉफ़ी होती है काफ़ी'
*
facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil'

बुधवार, 15 जनवरी 2014

kavya salila: cheeta -salil

कविता:
चीता
संजीव
*
कौन कहता है कि
चीता मर गया है?
हिंस्र वृत्ति
जहाँ देखो बढ़ रही है.
धूर्तता
किस्से नये
नित गढ़ रही है.
शक्ति के नाखून पैने
चोट असहायों पर करते
स्वाद लेकर रक्त पीते
मारकर औरों को जीते
और तुम?
और तुम कहते हो
चीता मर गया है.
नहीं,
वह तो
आदमी की
नस्ल में घर कर गया है.
झूठ कहते हो कि
चीता मर गया है.
=============

hindi vimarsh: ahnadabad ke hotal men gujrati -jawahar karnavat

हिंदी विमर्श:

अहमदाबाद में स्वभाषा प्रेम

होटल में गुजराती के उद्धरण व् पुस्तकें
Jawahar Karnavat की प्रोफाइल फोटो

-जवाहर कर्नावट, मुम्बई 075063 78525
 
संदेश में फोटो देखें
संदेश में फोटो देखें







Hindi in Seoul: Dr. Kavita Vachaknavee

हिंदी-विमर्श: 
सियोल मेट्रो में टैगोर की कविताएँ

डॉ. कविता वाचक्नवी
सियोल के एक मित्र से प्राप्त सूचना - 
स्मार्टफोन और टैबलेट में घुसी पड़ी कोरियन पब्लिक को साहित्य की ओर आकर्षित करने के लिए सरकार ने
​​
सियोल मेट्रो में टैगोर की कविताएँ लगाई हैं. भारत की सरकारें भी कुछ सीखें तो अच्छा हो.
 
__._,_.___From:  

hasya salila: challenge -sanjiv

हास्य सलिला:
चैलेन्ज
संजीव
*
लाली ने चैलेन्ज दिया: 'ए जी लल्लू के पप्पा!
पल भर को गुस्साऊं अगले पल गुस्से से कुप्पा
बोलो ऐसे बोल बोलकर क्या तुम दिखला सकते?
सफल हुए तो पैर दबाने से छुट्टी पा सकते'
अक्ल लगाकर लालू बोले: 'हे प्राणों से प्यारी!'
लाली मुस्का, गुर्राई सुन: 'मेरी मति गयी मारी
ब्याही तुमको जीभ न देखी जो है तेज दोधारी'
रूठीं तुम, मैं सुखी हुआ, ए लल्ली की महतारी!
पैर दबाने से छुट्टी पा मैं सचमुच आभारी'
लाली गरजी: 'कपड़ा, बर्तन करो न जाओ बाहर
बाई आयी नहीं, काम निबटाओ हे नर नाहर!
***

मंगलवार, 14 जनवरी 2014

hasya kavita: comedy show -sanjiv

हास्य कविता:
लालू -लाली कॉमेडी शो
संजीव
*
लालू से लाली हँस बोली: 'सुबह-सुबह सच सुन लो
भाग जगे जो मुझ सी बीबी पायी सपने बुन लो
अलादीन का ले चराग खोजो तो भी हारोगे
मुझ सी बीबी मिल न सकेगी, मुझ पर जां वारोगे'
लालू बोले: ' गलती की है एक बार सच मनो
दोबारा दोहराऊंगा मैं कभी नहीं सच जानो'
लालू-लाली की खिचखिच सुन बच्चे फिर मुस्काये
इनका कॉमेडी शो असली से ज्यादा मन भाये
------------------------------

bundeli parv mamulia - rajni gupt

बुंदेली लोक जीवन
‘ कांटन के चारों तरफ से फूलेां से सजाकर फिर घर घर जाकर गीत गाती थीं लड़किया
‘ मामुलिया के आय लिवौया , झमक चली मेरी मामुलिया
लिआव लियाव चंपा चमेली के फूल , सजाओ मेरी मामुलिया ।
ऐसे ही ढिरिया सजाई जात ती। घड़ा के चारों तरफ गोल गोल छेद करके उसके भीतर दीया रखौ जात फिर लड़कियां उसे सिर पर रखकर हर घर जाकर गाना गाकर पैसे मांगती । जैसे ही दो ढिरियां मिल जाती , हमाय गले से अपने आप गीत के बोल निकलने शुरू हो जाते –
‘ ढिरिया में ढिरिया मिल गयी , नारे सुआटा , ढिरिया जन्‍म्‍ा की सौत
, सौत पठा दो भइया मायके , नारे सुआटा , हम तुम करहै राज
राज भले भाई बाप के नारे सुआटा , जां ठाड़े तां खेल ,
जरे बरै वौ सासरों नारे सुआटा , जां ठाड़े तां सोच

virasat : dhruv Gupta


ध्रुव गुप्ता
पिछली रात एक बहुत पुराने संस्कृत ग्रंथ से गुज़रते हुए कई विलक्षण अनुभूतियां हुईं। ग्रंथ में संग्रहित किसी प्राचीन कवि की एक कविता ने बेहद बेचैन किया। कवि स्वयं अज्ञात है, लेकिन कविता की गहन संवेदना, व्यथा और बारीकी शिद्दत से महसूस होती है। उस अज्ञात विरही कवि की मूल कविता और अपना अनुवाद मित्रों से सांझा कर रहा हूं। शायद कवि का वह दर्द आप भी महसूस कर सकें ! -

पिछली रात एक बहुत पुराने संस्कृत ग्रंथ से गुज़रते हुए कई विलक्षण अनुभूतियां हुईं। ग्रंथ में संग्रहित किसी प्राचीन कवि की एक कविता ने बेहद बेचैन किया। कवि स्वयं अज्ञात है, लेकिन कविता की गहन संवेदना, व्यथा और बारीकी शिद्दत से महसूस होती है। उस अज्ञात विरही कवि की मूल कविता और अपना अनुवाद मित्रों से सांझा कर रहा हूं। शायद कवि का वह दर्द आप भी महसूस कर सकें !  - 'सुप्ते ग्रामे नदति जलदे शान्तसंतापरम्यं।पांथेनात्मव्यसनकरूनोद्स्त्रू गीतं निशीथे। स्फी तोत्कंठापरिगतधिया प्रोषितस्त्रीजनेन।ध्यानावेस्तिमितन नयनं श्रूयते रूद्यते च।  
ग्रामेस्मिन पथिकाय पांथ वसतिनैवाधुना दीयते। पश्यात्रेव विहारमंडपतले पान्थः प्रसुप्तो युवा।तेनोद्रीय खलेन गर्जति घने स्मृत्वा प्रियां तत्कृतं। येनाद्यपि करग्कदंडपतनाशंकी जनस्तिष्ठति।' 

सो गया था गांव
गरजने लगी थीं घटायें
फ़िर थमा गर्जन और अब
झमाझम बरसने लगा है पानी
कितना शांत और मनोरम है समय
ऐसे में जाने कौन बटोही
गा रहा है अपनी वेदना
उत्कंठा से घिर आई हैं
गांव की विरह की मारी स्त्रियां
सुन रही हैं और गहरे उतर रही हैं
ध्यान में
स्तब्ध हैं उनके नयन
शायद रो रही हैं वे निःशब्द

हे पथिक, अब इस गांव में
किसी बटोही को नहीं देंती हम
टिकने का ठिकाना
देखो उस विहार मंडप को
रात जब गरजने लगे थे बादल
उसके नीचे सोए 
एक दुष्ट युवक बटोही ने
अपनी प्रिया के स्मरण में 
गीत गाकर जाने क्या जादू किया 
कि आशंकित हैं अब तक हम
प्राण जाने के भय से !

'सुप्ते ग्रामे नदति जलदे शान्तसंतापरम्यं।
पांथेनात्मव्यसनकरूनोद्स्त्रू गीतं निशीथे।
स्फी तोत्कंठापरिगतधिया प्रोषितस्त्रीजनेन।
ध्यानावेस्तिमितन नयनं श्रूयते रूद्यते च।
ग्रामेस्मिन पथिकाय पांथ वसतिनैवाधुना दीयते। 

पश्यात्रेव विहारमंडपतले पान्थः प्रसुप्तो युवा।
तेनोद्रीय खलेन गर्जति घने स्मृत्वा प्रियां तत्कृतं। 
येनाद्यपि करग्कदंडपतनाशंकी जनस्तिष्ठति।'

भावानुवाद:

सो गया था गांव
गरजने लगी थीं घटायें
फ़िर थमा गर्जन और अब
झमाझम बरसने लगा है पानी
कितना शांत और मनोरम है समय
ऐसे में जाने कौन बटोही
गा रहा है अपनी वेदना
उत्कंठा से घिर आई हैं
गांव की विरह की मारी स्त्रियां
सुन रही हैं और गहरे उतर रही हैं
ध्यान में
स्तब्ध हैं उनके नयन
शायद रो रही हैं वे निःशब्द

हे पथिक, अब इस गांव में
किसी बटोही को नहीं देंती हम
टिकने का ठिकाना
देखो उस विहार मंडप को
रात जब गरजने लगे थे बादल
उसके नीचे सोए
एक दुष्ट युवक बटोही ने
अपनी प्रिया के स्मरण में
गीत गाकर जाने क्या जादू किया
कि आशंकित हैं अब तक हम
प्राण जाने के भय से !

hasya kavita: comedy show -sanjiv

हास्य कविता:
लालू -लाली कॉमेडी शो
संजीव
*
लालू से लाली हँस बोली: 'सुबह-सुबह सच सुन लो
भाग जगे जो मुझ सी बीबी पायी सपने बुन लो
अलादीन का ले चराग खोजो तो भी हारोगे
मुझ सी बीबी मिल न सकेगी, मुझ पर जां वारोगे'
लालू बोले: ' गलती की है एक बार सच मनो
दोबारा दोहराऊंगा मैं कभी नहीं सच जानो'
लालू-लाली की खिचखिच सुन बच्चे फिर मुस्काये
इनका कॉमेडी शो असली से ज्यादा मन भाये

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सोमवार, 13 जनवरी 2014

MUKTAK: SWATANTRATA DIVAS -SANJIV

मुक्तक
संजीव
*

शहादतों को भूलकर सियासतों को जी रहे 
पड़ोसियों से पिट रहे हैं और होंठ सी रहे
कुर्सियों से प्यार है, न खुद पे ऐतबार है-
नशा निषेध इस तरह कि मैकदे में पी रहे
*
जो सच कहा तो घेर-घेर कर रहे हैं वार वो
हद है ढोंग नफरतों को कह रहे हैं प्यार वो
सरहदों पे सर कटे हैं, संसदों में बैठकर-
एक-दूसरे को कोस, हो रहे निसार वो
*
मुफ़्त भीख लीजिए, न रोजगार माँगिए
कामचोरी सीख, ख्वाब अलगनी पे टाँगिए
फर्ज़ भूल, सिर्फ हक की बात याद कीजिए-
आ रहे चुनाव देख, नींद में भी जागिए
*
और का सही गलत है, अपना झूठ सत्य है
दंभ-द्वेष-दर्प साध, कह रहे सुकृत्य है
शब्द है निशब्द देख भेद कथ्य-कर्म का-
वार वीर पर अनेक कायरों का कृत्य है
*
प्रमाणपत्र गैर दे: योग्य या अयोग्य हम?
गर्व इसलिए कि गैर भोगता, सुभोग्य हम
जो न हाँ में हाँ कहे, लांछनों से लाद दें -
शिष्ट तज, अशिष्ट चाह, लाइलाज रोग्य हम
*
गंद घोल गंग में तन के मुस्कुराइए
अनीति करें स्वयं दोष प्रकृति पर लगाइए
जंगलों के, पर्वतों के नाश को विकास मान-
सन्निकट विनाश आप जान-बूझ लाइए
*
स्वतंत्रता है, आँख मूँद संयमों को छोड़ दें
नियम बनायें और खुद नियम झिंझोड़-तोड़ दें
लोक-मत ही लोकतंत्र में अमान्य हो गया-
सियासतों से बूँद-बूँद सत्य की निचोड़ दें
*
हर जिला प्रदेश हो, राग यह अलापिए
भाई-भाई से भिड़े, पद पे जा विराजिए
जो स्वदेशी नष्ट हो, जो विदेशी फल सके-
आम राय तज, अमेरिका का मुँह निहारिए
*
धर्महीनता की राह, अल्पसंख्यकों की चाह
अयोग्य को वरीयता, योग्य करे आत्म-दाह
आँख मूँद, तुला थाम, न्याय तौल बाँटिए-
बहुमतों को मिल सके नहीं कहीं तनिक पनाह
*
नाम लोकतंत्र, काम लोभतंत्र कर रहा
तंत्र गला घोंट लोक का विहँस-मचल रहा
प्रजातंत्र की प्रजा है पीठ, तंत्र है छुरा-
राम हो हराम, तज विराम दाल दल रहा
*
तंत्र थाम गन न गण की बात तनिक मानता
स्वर विरोध का उठे तो लाठियां है भांजता
राजनीति दलदली जमीन कीचड़ी मलिन-
लोक जन प्रजा नहीं दलों का हित ही साधता
*
धरें न चादरों को ज्यों का त्यों करेंगे साफ़ अब
बहुत करी विसंगति करें न और माफ़ अब
दल नहीं, सुपात्र ही चुनाव लड़ सकें अगर-
पाक-साफ़ हो सके सियासती हिसाब तब
*
लाभ कोई ना मिले तो स्वार्थ भाग जाएगा
देश-प्रेम भाव लुप्त-सुप्त जाग जाएगा
देस-भेस एक आम आदमी सा तंत्र का-
हो तो नागरिक न सिर्फ तालियाँ बजाएगा
*
धर्महीनता न साध्य, धर्म हर समान हो
समान अवसरों के संग, योग्यता का मान हो
तोडिये न वाद्य को, बेसुरा न गाइए-
नाद ताल रागिनी सुछंद ललित गान हो
*
शहीद जो हुए उन्हें सलाम, देश हो प्रथम
तंत्र इस तरह चले की नयन कोई हो न नम
सर्वदली-राष्ट्रीय हो अगर सरकार अब
सुनहरा हो भोर, तब ही मिट सके तमाम तम
=============================

SHRI DEVARAHA BABA JAN KALYAN TRUST


SHRI DEVARAHA BABA JAN KALYAN TRUST

Regd. No. 02/b/113/12-13/BPL

Founder Trustee Members

Management Commitee

Hon. Chairman cum president
Shri Satish Chandra Varma
A 436 Shahpura, Bhopal 462039, 0755 2426124, 91 94250 20819, satish_saroj1928@yahoo.com

Hon.Vice President
Shri Sanjeev Kumar Varma
oo1 248 652 8586, 001 248 990 0670, 91 9993562126, sanjeev_varma@comcast.net

Hon.Secretary
Shrimati Awantika Varma
91 9893372126, avarma64@yahoo.com

Hon.Treasurer
Anurag BHatnagar
91 9755166198, anuanu_b@rediffmail.com

Hon.Finencial Advisor
Shri Sachin Saxena, 0755- 2778828/ 4222164, sachins75@rediffmail.com

Members

Shri Manoj Kumar Saxena
65 65205256, 65 83312884, saxena.manoj@gmail.com

Dr. Smt. Anjali Saxena
91 9329694541, anjali.manoj@gnail.com

Dr. Sudhakar Prasad
505 823 9650, 505 270 0147, sprasad@unm.edu

Dr. Arti Prasad
505 823 9650, 505 270 8454, aprasad@salud.unm.edu

Shri Dinesh Sinha
91 9971365085, dineshsinha@dainikbhaskargroup.com

Reena Sinha
91 9971365085, dineshsinha@dainikbhaskargroup.com

Dr. Pratul Sinha
91 9489147752, drpratul@gmail.com

Acharya Er. Sanjiv Verma 'Salil'
91 0761 2411131, 91 94251 83244, salil.sanjiv@gmail.com, divynarmada@gmail.com


शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

MUKTIKA: KAISE? -SANJIV

मुक्तिका:
कैसे?… 
संजीव
*
जो हकीकत है तेरी दुनिया बताऊँ कैसे?
आइना आँख के अंधे को दिखाऊँ कैसे?
*
बात बढ़-चढ़ के तू करता है, तुझे याद रहे
तू है नापाक, तुझे पाक बुलाऊँ कैसे?
*
पाल चमचों को, नहीं कोई बड़ा होता है.
पूत दरबार में चढ़ पाए, सिखाऊँ कैसे?
*
हैं सितारे तेरे गर्दिश में सम्हल ऐ नादां!
तू है तिनका, तुझे बारिश में बचाऊँ कैसे?
*
'चोर की दाढ़ी में तिनका' की मसल याद रहे
किसी काने को कहो टेंट दिखाऊँ कैसे?
*
पीठ में भाई की भाई ने छुरा फिर घोंपा
लाल हैं सरहदें मस्तक न जुकाऊँ कैसे?
*
देख होता है अनय सच को छिपाऊँ कैसे?​
​कल कहा ठीक, गलत आज बताऊँ कैसे?
*
शीश कटते हैं जवानों के, नयन नम होते-
​सुन के भाषण औ' बहस महुद को मनाऊँ कैसे??
Sanjiv verma 'Salil'
salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.in

MUKTAK SALILA: SANJIV

मुक्तक सलिला :
संजीव
*
मन रोता है सचमुच लेकिन, फिर भी हँसना पड़ता है

रो न सके जो ऐसे मन में, सत्य कहें तो जड़ता है
सुमन सुरभि सौगात लुटाता, 'सलिल' बुझाता प्यास सदा -
फर्क न पड़ता खुश हो कोई, या बेबात बिगड़ता है 
*
अपनी राह चला चल साथी, अनदेखी कर बाधा की  
श्याम काम निष्काम करें, सुधि कब बिसराएँ राधा की 
बृज वृन्दावन इन्द्रप्रस्थ द्वारका सभी हैं एक समान-
मिले प्रशंसा या हो निंदा, अनदेखी हर व्याधा की 
*
सारमेय मिल शोर करें तो, गज ने कब निज पग रोके 
मंजिल मिले उन्हें जो चलते, चाहे जग कितना टोके 
अपनी-अपनी समझ, न करना फ़िक्र चला चल सतत 'सलिल' 
 वर्षा, धूप, अँधेरा, तूफां रोके, मत रुक बढ़ हारें झोंके

मर्यादा का हनन करें जो, उन्हें न अब नेतृत्व मिले 
ठुकरा दें अपराधी नेता, अब सच्चा नेतृत्व मिले 
दल मिल संगामित्ती खेलें, ठेंगा इनको दिखला दो-
जन प्रतिनिधि हो जनगण जैसा, कोई न सुविधा अन्य मिले 
*
नूरा कुश्ती से ठगते हैं,नेता सच को पहचानो 
सगा नहीं जनता का, कोई  दल इस सच को जानो 
अफसरशाही स्वार्थ साधती, धनपति देता है रिश्वत- 
रहबर जिनको समझा हमने, रहजन हैं यह सच मानो
*

chhand salila: gang chhand -sanjiv

छंद सलिला:
नौ मात्रिक छंद गंग
संजीव
*
संजीव
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रा वज्रा, उपेन्द्र वज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, प्रेमा, वाणी, शक्तिपूजा, सार, माला, शाला, हंसी, दोधक, सुजान, छवि)

*
९ वसुओं के आधार पर नौ मात्राओं के छंदों को वासव छंद कहा गया है. नवधा भक्ति,  नौ रस, नौ अंक, अनु गृह, नौ निधियाँ भी नौ मात्राओं से जोड़ी जा सकती हैं. नौ मात्राओं के ५५ छंदों को ५ वर्गों में विभाजित किया जा सकता है.
१. ९ लघु मात्राओं के छंद                  १
२. ७ लघु + १ गुरु मात्राओं के छंद       ७
३. ५ लघु + २ गुरु मात्राओं के छंद     २१
४. ३ लघु + ३ गुरु मात्राओं के छंद     २०
५. १ लघु + ४ गुरु मात्राओं के छंद      ५

नौ मात्रिक छंद गंग
नौ मात्रिक गंग छंद के अंत में २ गुरु मात्राएँ होती हैं.
उदाहरण:
१. हो गंग माता / भव-मुक्ति-दाता
   हर दुःख हमारे / जीवन सँवारो
   संसार चाहे / खुशियाँ हजारों
   उतर आसमां से / आओ सितारों
   जन्नत जमीं पे, नभ से उतारो
   शिव-भक्ति दो माँ / भाव-कष्ट-त्राता
२. दिन-रात जागो / सीमा बचाओ
   अरि घात में है / मिलकर भगाओ
   तोपें चलाओ / बम भी गिराओ
​   ​
​सेना लड़ेगी / सब साथ आओ ​


​३. बचपन हमेशा / चाहे कहानी ​

​   है साथ लेकिन / दादी न नानी ​

​   हो ज़िंदगानी / कैसे सुहानी ​

​   सुने न किस्से, न / बातें बनानी

   *****​

chhand salila: chhavi chhand - sanjiv

छंद सलिला:
अष्ट मात्रिक छवि छंद
संजीव
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रा वज्रा, उपेन्द्र वज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, प्रेमा, वाणी, शक्तिपूजा, सार, माला, शाला, हंसी, दोधक, सुजान)
*
अष्ट मात्रिक छन्दों को ८ वसुओं के आधार पर 'वासव छंद' कहा गया है. इस छंदों के ३४ भेद सम्भव हैं जिनकी मात्रा बाँट निम्न अनुसार होगी:
अ. ८ लघु: (१) १. ११११११११,
आ. ६ लघु १ गुरु: (७) २. ११११११२ ३. १११११२१, ४. ११११२११, ५. १११२१११, ६. ११२११११, ७. १२१११११, ८. २११११११,
इ. ४ लघु २ गुरु: (१५) ९. ११११२२, १०. १११२१२, ११. १११२२१, १२, ११२१२१, १३. ११२२११, १४, १२१२११, १५. १२२१११,  १६. २१२१११, १७. २२११११, १८. ११२११२,, १९. १२११२१, २०. २११२११, २२. १२१११२, २३. २१११२१,
ई. २ लघु ३ गुरु: (१०) २४. ११२२२, २५. १२१२२, २६. १२२१२, २७. १२२२१, २८. २१२२१, २९. २२१२१, ३०. २२२११, ३१. २११२२, ३२. २२११२, ३३. २१२१२
उ. ४ गुरु: (१) २२२२
विविध चरणों में इन भेदों का प्रयोग कर और अनेक उप प्रकार हो सकते हैं.
उदाहरण:
१. करुणानिधान! सुनिए पुकार, / रख दास-मान, भव से उबार
२. कर ले सितार, दें छेड़ तार / नित तानसेन, सुध-बुध बिसार
३. जब लोकतंत्र, हो लोभतंत्र / बन कोकतंत्र, हो शोकतंत्र
--------
salil.sanjiv@gmail.com
hindisahityasalila.blogspot.in
facebook: chhand salila
*
 

गुरुवार, 9 जनवरी 2014

hasya salila: yaad -sanjiv

हास्य सलिला:
याद
संजीव 'सलिल'
*
कालू से लालू कहें, 'दोस्त! हुआ हैरान.
घरवाली धमका रही, रोज खा रही जान.
पीना-खाना छोड़ दो, वरना दूँगी छोड़.
जाऊंगी मैं मायके, रिश्ता तुमसे तोड़'
कालू बोला: 'यार! हो, किस्मतवाले खूब.
पिया करोगे याद में, भाभी जी की डूब..
बहुत भली हैं जा रहीं, कर तुमको आजाद.
मेरी भी जाए कभी प्रभु से है फरियाद..'
____________________

kavita: geedh -sanjiv

काव्य सलिला:
गीध
संजीव
*
जब स्वार्थ-साधन,
लोभ-लालच,
सत्ता और सुविधा तक
सीमित रह जाए
नाक की सीध
तब समझ लो आदमी
इंसान नहीं रह गया
बन गया है गीध.

***

बुधवार, 8 जनवरी 2014

hasya salila: umar kaid - sanjiv

हास्य सलिला:
उमर कैद
संजीव 
*
लालू पहुँचे कचहरी बैठे चुप दम साध
जज बोलीं: 'दिल चुराया, है चोरी अपराध
हाथ जोड़ उत्तर दिया: ' क्षमा करें सरकार!
दिल देकर दिल ले लिया, किया महज व्यापार'
'लाइसेंस-कर के बिना, बिजनेसकरना दोष'
मौका मिले हुजूर तो भर देंगे हैम कोष'
'बेजा कब्जा कर बसे दिल में छीना चैन
रात ख्वाब में आ रहे, भले बंद हों नैन'
'लाख करो इंकार पर मानेंगे इकरार
करो जुर्म स्वीकार चुप, बंद करो तकरार'
'देख अदा लत लग गयी, किया न कोई गुनाह
बैठ अदालत में भरें नित दिल थामे आह'
'नहीं जमानत मिलेगी, सात पड़ेंगे फंद'
उमर कैद की सजा सुन , हुई बोलती बंद
*************

naye varsh par: Deoki nandan shant

image.jpeg दिखा रहा है
विरासत:
राष्ट्र होकर उपस्थित होना
बालकवि बैरागी : जन्मदिन विशेष
बालकवि बैरागी
*
पानी, पहाड़ों और पेड़ों से ही
नहीं पहचाना जाता है देश.
सभ्यता, संस्कृति और संस्कारों से भी
पहचान होती है किसी भू भाग की.
पर इन सभी की अस्मिता को
अभिव्यक्त करती है कोई भाषा।
और वह ही नहीं हो
हमारे पास
तब पानी, पहाड़ों, पेड़ों
सभ्यता, संस्कृति और
संस्कारों को होती है
घनघोर निराशा।
बेशक शब्द होते हैं
भाषा के संवाहक
और लिपि होती है
भाषा की पालकी
पर जब उच्चरित होती है
अस्मिता
तब ज्ञात होता है
क्या हैं हम?
स्वयं एक देश होकर
उच्चरित होना
एक महान देश होकर
उद्भासित होना
औए एक स्वाभिमानी
राष्ट्र होकर उपस्थित होना
अर्थ रखता है
बहुत कुछ.
और जब सार्थकता का सूरज
निकल आये हर दिशा से
तब फिर कौन सा डर है
काली कलूटी निशा से.
समृद्ध शब्द
सार्थक लिपि
और समृद्ध भाषा
हम बनें ही नहीं
बनायें भी
उजले अस्मिता पूर्ण सुरों को
सुनें ही नहीं
सुनाएँ भी.
***

मंगलवार, 7 जनवरी 2014

एक कविता:
चीता
संजीव
*
कौन कहता है
कि चीता मर गया है?
हिंस्र वृत्ति
जहाँ देखो बढ़ रही है.
धूर्तता
किस्से नए नित गढ़ रही है.
शक्ति के नाखून पैने,
चोट असहायों पर करते,
स्वाद लेकर रक्त पीते,
मारकर औरों को जीते।

और तुम?
और तुम कहते हो
चीता मर गया है.
नहीं,
वह तो आदमी की नस्ल में
घर कर गया है.
कौन कहता है कि
चीता मर गया है?
****

chhand salila: Sujan chhand -sanjiv


छंद सलिला:
सुजान छंद

संजीव
*
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रा वज्रा, उपेन्द्र वज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, प्रेमा, वाणी, शक्तिपूजा, सार, माला, शाला, हंसी,
दोधक)

सुजान २ पंक्तियों का मात्रिक छंद है. इस छंद में हर पंक्ति में १४ तथा ९ मात्राओं पर यति तथा गुरु लघु पदांत का विधान है.

चौदह-नौ यति रख रचें, कविगण छंद सुजान 
हो पदांत गुरु-लघु 'सलिल', रचना रस की खान

उदाहरण:
१. चौदह-नौ पर यति सूजन, में 'सलिल' न भूल।
   गुरु-लघु से पद अंत करे, तो महके फूल।।

२. दर न मुझको किसी का भी, है दयालु ईश।
   देश हित है 'सलिल' सस्ता, दे देना शीश।।
३. कोयल कूके बागों में, पनघट में शोर।
   मौर खिले अमराई में, खेतों में भोर।। 
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ek kavita: baaz -sanjiv

एक कविता:
बाज
संजीव
*
अगर नाप सको
नीले गगन की ऊँचाई
बेधड़क-बेखौफ।
चप्पे-चप्पे पर
रख सको नज़र।
सामर्थ्य और औकात का
कर सको
सही-सही अंदाज़।
बिना बनाये नहाना
तलाश कर लक्ष्य
साध सको निशाना।
पल में भर सको
इतनी तेज परवाज़
कि पीछे रह जाए आवाज़।
तभी,
केवल तभी
पूरा कर सकोगे काज
ज़मानी को होगा तुम पर नाज़
आदमी होते हुए भी
कहला सकोगे बाज़।
***

सोमवार, 6 जनवरी 2014

chhand salila: dodhak chhand -sanjiv

छंद सलिला:
दोधक छंद

संजीव
*
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रा वज्रा, उपेन्द्र वज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, प्रेमा, वाणी, शक्तिपूजा, सार, माला, शाला, हंसी)

दोधक दो गुरु तुकान्ती पंक्तियों का मात्रिक छंद है. इस छंद में हर पंक्ति में ३ भगण तथा २ गुरु कुल १६ मात्राएँ तथा ११ वर्ण मात्राएँ होते हैं.
तीन भगन दो गुरु मिल रचते, दोधक छंद ललाम
ग्यारह अक्षर सोलह मात्रा, तालमेल अभिराम

उदाहरण:
१. काम न काज जिसे वह नेता। झूठ कहे जन-रोष प्रणेता।।                                                 
होश न हो पर जोश दिखाये। लोक ठगा सुनता रह जाए।।                                                    
दे खुद ही खुद को यश सारा। भोग रहा पद को मद-मारा।।

२. कौन कहो सुख-चैन चुराते। काम नहीं पर काम जताते।।
मोह रहे कब से मन मेरा। रावण की भगिनी पग-फेरा।।                                                   
होकर बेसुध हाय लगाती। निष्ठुर कौन? बनो मम साथी।।                                                    
स्त्री मुझ सी तुम सा नर पाये। मान कहा, नहिं जीवन जाए।। 
३. बंदर बालक एक सरीखे… 
बात न मान करें मनमानी। मान रहे खुद को खुद ज्ञानी।
कौन कहे कब क्या कर देंगे। कूद गिरे उठ रो-हँस लेंगे।  
ऊधम खूब करें, संग चीखें…     
खा कम फेंक रहे मिल ज्यादा, याद नहीं रहता निज वादा।  
शांत रहें खाकर निज कसमें, आज कहें बिसरें सब रस्में।  
राह नहीं इनको कुछ दीखे…                                                                                         -----------------------
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रविवार, 5 जनवरी 2014

shok samachar: bhagwat swarup kulshreshth passed away -sanjiv

शोक समाचार:
Bhagwat Swaroop Kulshrestha.jpg दिखा रहा है
चित्रांश भगवत स्वरुप कुलश्रेष्ठ दिवंगत

जयपुर, शनिवार ४ जनवरी २०१३। आज प्रातः सक्रिय समाजसेवी चित्रांश भगवत स्वरुप कुलश्रेष्ठ का हृदयाघात से अचानक निधन हो गया. वे राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद् के उपाध्यक्ष तथा राजस्थान-गुजरात प्रांतों के प्रभारी थे. शांत तथा समर्पण भाव से समाज सेवा के लिए सदा तत्पर रहनेवाले कुलश्रेष्ठ जी राजनैतिक - सामाजिक जीवनमें सादगी और आदर्शों के पक्षधर थे.

ईश्वर उनकी आत्मा को मुक्ति तथा परिवार जनों को यह असीम क्षति सहने की शक्ति
प्रदान करें। हम कुलश्रेष्ठ जी के स्वजनों के साथ शोक की इस घड़ी में सम्मिलित
हैं.

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

महामंत्री

राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद

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chhand salila: hansi chhand -sanjiv

छंद सलिला:
हंसी छंद

संजीव
*
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रा वज्रा, उपेन्द्र वज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, प्रेमा, वाणी, शक्तिपूजा, सार, माला, शाला)

हंसी छंद में २ पद, ४ चरण, ४४ वर्ण तथा ७० मात्राएँ होती हैं. प्रथम-तृतीय चरण उपेन्द्रवज्रा जगण तगण जगण २ गुरु तथा द्वितीय-चतुर्थ चरण में इन्द्रवज्रा तगण तगण जगण २ गुरु मात्राएँ होती हैं.
हंसी-चरण इन्द्रवज्रा में, दूजा-चौथा हों लें मान
हो उपेन्द्रवज्रा में पहला-तीजा याद रखें श्री मान

उदाहरण:
१. न हंस-हंसी बदलें ठिकाना, जानें नहीं वे करना बहाना
    न मांसभक्षी तजते डराना, मानें नहीं ठीक दया दिखाना

२. सियासती लोग न जान पाते, वादे किये जो- जनता न भूले
    दिखा सके जो धरती अजाने, कोई न जाने उसको बचाना
३. हँसें न रोयें चुपचाप देखें, होता तमाशा हर रोज़ कोई
    मिटा न  पायें हम आपदाएँ, जीतें हमेशा हँस मुश्किलों को
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शनिवार, 4 जनवरी 2014

hasya kavita: ek paheli -sanjiv


हास्य रचना :
एक पहेली
संजीव
*
लालू से लाली हँस बोली: 'बूझो एक पहेली'
लालू थे मस्ती में बोले: 'पूछो शीघ्र सहेली'
लाली बोली: 'किस पक्षी के सिर पर पैर बताओ?
अकल लगाओ, मुँह बिसूर खोपड़िया मत खुजलाओ,
बूझ सकोगे अगर मिलेगा हग-किस तुमको आज
वर्ना झाड़ू-बर्तन करना, पैर दबा पतिराज'
कोशिश कर हारे लालूजी बोले 'हल बतलाओ
शर्त करूँगा पूरी मन में तुम संदेह न लाओ'
लाली बोली: 'तुम्हें रहा है सदा अकल से बैर'
'तब ही तुमको ब्याहा' मेरी अब न रहेगी खैर'
'बकबकाओ मत, उत्तर सुनकर चलो दबाओ पैर
हर पक्षी का होता ही है देखो सिर, पर, पैर
माथा ठोंका लालू जी ने झुँझलाये, खिसियाये
पैर दबाकर लाली जी के अपने प्राण बचाये।
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गुरुवार, 2 जनवरी 2014

hasya rachna: lalu-lalee -sanjiv

​​
हास्य रचना :
लालू-लाली
संजीव
*
लाली थी बाज़ार में बॉयफ्रेंड के संग.
लालू ने देखा रहे पहले चुप, हो दंग.
गुस्सा आया फ्रेंड को जमकर मारी मार.
लाली बोली: ''कीजिये, और जोर से वार.
अपने बीबी को कभी लाये नहीं बाज़ार
इसे सुहाता घूमना ले औरों की नार.''
बॉय फ्रेंड ने उलट दी बाजी, पलटी मार.
लालू पिटते देखकर लाली चीखी: ''पीट ,
खुद लेकर जाता नहीं बीबी को बाज़ार
और कोई ले जाए तो करता है तकरार
नारी अब शिक्षित हुई जान गयी अधिकार''
अन्य दोस्त के संग हुई लाली तुरत फरार।
*
Sanjiv verma 'Salil'
salil.sanjiv@gmail.com
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