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बुधवार, 28 मई 2014

chhand salila: rola chhand -sanjiv



छंद सलिला:   ​​​

रोला  छंद ​

संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति अवतारी, चार पद, प्रति चरण दो पद - मात्रा २४ मात्रा, यति ग्यारह तेरह, पदांत गुरु (यगण, मगण, रगण, सगण), विषम पद सम तुकांत, 


लक्षण छंद:

आठ चरण पद चार, ग्यारह-तेरह यति रखें  
आदि जगण तज यार, विषम-अंत गुरु-लघु दिखें  
गुरु-गुरु से सम अंत, जाँचकर रचिए रोला
अद्भुत रस भण्डार, मजा दे ज्यों हिंडोला 

उदाहरण: 

१. सब होंगे संपन्न, रात दिन हँसें-हँसायें 
    कहीं न रहें विपन्न, कीर्ति सुख सब जन पायें 
    भारत बने महान, श्रमी हों सब नर-नारी 
    सद्गुण की हों खान, बनायें बिगड़ी सारी

२. जब बनती है मीत, मोहती तभी सफलता 
    करिये जमकर प्रीत, न लेकिन भुला विफलता 
    पद-मद से रह दूर, जमाये निज जड़ रखिए
    अगर बन गए सूर, विफलता का फल चखिए  
    
३.कोटि-कोटि विद्वान, कहें मानव किंचित डर 
   तुझे बना लें दास, अगर हों हावी तुझपर
   जीव श्रेष्ठ निर्जीव, हेय- सच है यह अंतर 
   'सलिल' मानवी भूल, न हों घातक कम्प्यूटर

टीप: 
रोल के चरणान्त / पदांत में गुरु के स्थान पर दो लघु मात्राएँ ली जा सकती हैं. 
सम चरणान्त या पदांत सैम तुकान्ती हों तो लालित्य बढ़ता है. 
रचना क्रम विषम पद: ४+४+३ या ३+३+२+३ / सम पद ३+२+४+४ या ३+२+३+३+२  
कुछ रोलाकारों ने रोला में २४ मात्री पद और अनियमित गति रखी है.
नविन चतुर्वेदी के अनुसार रोला की बहरें निम्न हैं:
अपना तो है काम छंद  की करना 
फइलातुन फइलात फाइलातुन फइलातुन 
२२२ २२१ = ११ / २१२२ २२२ = १३ 
भाषा का सौंदर्य, सदा सर चढ़कर बोले
फाइलुन मफऊलु / फ़ईलुन फइलुन फइलुन
२२२ २२१ = ११ / १२२ २२ २२ = १३
                       
                         *********  
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, रोला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, शोभन, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

रविवार, 25 मई 2014

haiku charcha: sanjiv

हाइकु चर्चा : १. 

संजीव 
*
हाइकु (Haiku 俳句 high-koo) ऐसी लघु कवितायेँ हैं जो एक अनुभूति या छवि को व्यक्त करने के लिए संवेदी भाषा प्रयोग करती है. हाइकु बहुधा प्रकृति के तत्व, सौंदर्य के पल या मार्मिक अनुभव से प्रेरित होते हैं. मूलतः जापानी कवियों द्वारा विकसित हाइकु काव्यविधा अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओँ द्वारा ग्रहण की गयी. 
  • पाश्चात्य काव्य से भिन्न हाइकु में सामान्यतः तुकसाम्य, छंद बद्धता या काफ़िया नहीं होता। 
  • हाइकु को असमाप्त काव्य  कहा जाता है चूँकि हर हाइकु में पाठक / श्रोता के मनोभावों के अनुसार पूर्ण किये जाने की अपेक्षा होती  है. 
  • हाइकु का उद्भव 'रेंगा नहीं हाइकाइ haikai no renga' (सहयोगी काव्य समूह जिसमें शताधिक छंद होते हैं) से हुआ है. 'रेंगा' समूह का प्रारंभिक छंद 'होक्कु'  मौसम तथा अंतिम शब्द का संकेत करता है. हाइकु काव्य-शिल्प इस परंपरा की निरंतरता  बनाये रखता है. 
  • समकालिक हाइकुकार कम से कम शब्दों से लघु काव्य रचनाएँ करते हैं. ३-५-३ सिलेबल के लघु हाइकु खूब लोकप्रिय हैं. 
हाइकु का वैशिष्ट्य 

१. ध्वन्यात्मक संरचना:

Write a Haiku Poem Step 2.jpgपारम्परिक जापानी हाइकु १७ ध्वनियों का समुच्चय है जो ५-७-५ ध्वनियों की ३ पदावलियों में विभक्त होते हैं. अंग्रेजी के कवि इन्हें सिलेबल (लघुतम उच्चरित ध्वनि) कहते हैं. समय के साथ विकसित हाइकु काव्य के अधिकांश हाइकुकार अब इस संरचना का अनुसरण नहीं करते। जापानी या अंग्रेजी के आधुनिक हाइकु न्यूनतम एक से लेकर सत्रह से अधिक ध्वनियों तक के होते हैं. अंग्रेजी सिलेबल लम्बाई में बहुत परिवर्तनशील होते है जबकि जापानी सिलेबल एकरूपेण लघु होते हैं. इसलिए 'हाइकु चंद ध्वनियों का उपयोग कर एक छवि निखारना है' की पारम्परिक धारणा से हटकर १७ सिलेबल का अंग्रेजी हाइकु १७ सिलेबल के जापानी हाइकु की तुलना में बहुत लंबा होता है. ५-७-५ सिलेबल का बंधन बच्चों को विद्यालयों में पढाये जाने के बावजूद अंग्रेजी हाइकू लेखन में प्रभावशील नहीं है. हाइकु लेखन में सिलेबल निर्धारण के लिये जापानी अवधारणा "हाइकु एक श्वास में अभिव्यक्त कर सके" उपयुक्त है. अंग्रेजी में सामान्यतः  इसका आशय १० से १४ सिलेबल लंबी पद्य रचना से है. अमेरिकन उपन्यासकार जैक कैरोक का एक हाइकु देखें:

Snow in my shoe         मेरे जूते में बर्फ 
Abandoned                  परित्यक्त 
Sparrow's nest             गौरैया-नीड़ 


२. वैचारिक सन्निकटता:

हाइकु में दो विचार सन्निकट हों: जापानी शब्द 'किरु' अर्थात 'काटना' का आशय है कि हाइकु में दो सन्निकट विचार हों जो व्याकरण की दृष्टि से स्वतंत्र तथा कल्पना प्रवणता की दृष्टि से भिन्न हों. सामान्यतः जापानी हाइकु 'किरेजी' (विभाजक शब्द) द्वारा विभक्त दो सन्निकट विचारों को समाहित कर एक सीधी पंक्ति में रचे जाते हैं. किरेजी एक ध्वनि पदावली (वाक्यांश) के अंत में आती है. अंग्रेजी में किरेजी की अभिव्यक्ति - से की जाती है. बाशो के निम्न हाइकु में दो भिन्न विचारों की संलिप्तता देखें: 

how cool the feeling of a wall against the feet — siesta

कितनी शीतल दीवार की अनुभूति पैर के विरुद्ध 

आम तौर पर अंग्रेजी हाइकु ३ पंक्तियों में रचे जाते हैं. २ सन्निकट विचार (जिनके लिये २ पंक्तियाँ ही आवश्यक हैं) पंक्ति-भंग, विराम चिन्ह अथवा रिक्त स्थान द्वारा विभक्त किये जाते हैं. अमेरिकन कवि ली गर्गा का एक हाइकु देखें- 

fresh scent-                     ताज़ा सुगंध 
the lebrador's muzzle       लेब्राडोर की थूथन 
deepar into snow             गहरे बर्फ में.

सारतः दोनों स्थितियों  में, विचार- हाइकू का दो भागों में विषयांतर कर अन्तर्निहित तुलना द्वारा रचना के आशय को ऊँचाई देता है. इस द्विभागी संरचना की प्रभावी निर्मिति से दो भागों के अंतर्संबंध तथा उनके मध्य की दूरी का परिहार हाइकु लेखन का कठिनतम भाग है.

३. विषय चयन और मार्मिकता

पारम्परिक हाइकु मनुष्य के परिवेश, पर्यावरण और प्रकृति पर केंद्रित होता है. हाइकु को ध्यान की एक विधि के रूप में देखें जो स्वानुभूतिमूलक व्यक्तिनिष्ठ विश्लेषण या निर्णय आरोपित किये बिना वास्तविक वस्तुपरक छवि को सम्प्रेषित करती है. जब आप कुछ  ऐसा देखें या अनुभव करे जो आपको अन्यों को बताने के लिए प्रेरित करे तो उसे 'ध्यान से देखें', यह अनुभूति हाइकु हेतु उपयुक्त हो सकती है.  जापानी कवि क्षणभंगुर प्राकृतिक छवियाँ यथा मेंढक का तालाब में कूदना, पत्ती पर जल वृष्टि होना, हवा से फूल का झुकना आदि को ग्रहण  व सम्प्रेषित करने के लिये हाइकु का उपयोग करते हैं. कई कवि 'गिंकगो वाक' (नयी प्रेरणा की तलाश में टहलना) करते हैं. आधुनिक हाइकु प्रकृति से पर हटकर शहरी वातावरण, भावनाओं, अनुभूतियों, संबंधों, उद्वेगों, आक्रोश, विरोध, आकांक्षा, हास्य आदि को हाइकू की विषयवस्तु बना रहे हैं. 

४. मौसमी संदर्भ

जापान में  'किगो' (मौसमी बदलाव, ऋतु परिवर्तन आदि) हाइकु का अनिवार्य तत्व है. मौसमी संदर्भ स्पष्ट या प्रत्यक्ष (सावन, फागुन आदि) अथवा सांकेतिक या परोक्ष (ऋतु विशेषमें खिलनेवाले फूल, मिलनेवाले फल, आनेवाले पर्व आदि) हो सकते हैं. फुकुडा चियो नी रचित हाइकु देखें:

morning glory!                               भोर की महिमा
the well bucket-entangled,            कुआं - बाल्टी गठबंधन
I ask for water                                मैंने पानी माँगा 

५. विषयांतर: 

हाइकु में दो सन्निकट विचारों की अनिवार्यता को देखते हुए चयनित विषय के परिदृश्य को इस प्रकार बदलें कि रचना में २ भाग हो सकें. जैसे लकड़ी के लट्ठे पर रेंगती दीमक पर केंद्रित होते समय उस छवि को पूरे जंगल या दीमकों के निवास के साथ जोड़ें। सन्निकटता तथा संलिप्तता हाइकु को सपाट वर्णन के स्थान पर गहराई तथा लाक्षणिकता प्रदान करती हैं. रिचर्ड राइट का यह हाइकु देखें: 

A broken signboard banging       टूटा साइनबोर्ड तड़का
In the April wind.                          अप्रैल की हवाओं में
Whitecaps on the bay.                 खाड़ी में झागदार लहरें 

६. संवेदी भाषा-सूक्ष्म विवरण: 

हाइकु गहन निरीक्षणजनित सूक्ष्म विवरणों से निर्मित और संपन्न होता है. हाइकुकार किसी घटना को साक्षीभाव (तटस्थता) से देखता है और अपनी आत्मानुभूति शब्दों में ढालकर अन्यों तक पहुँचाता है. हाइकु का विषय चयन करने के पश्चात उन विवरणों का विचार करें जिन्हें आप हाइकु में देना चाहते हैं. मस्तिष्क को विषयवस्तु पर केंद्रित कर विशिष्टताओं से जुड़े प्रश्नों का अन्वेषण करें। जैसे: अपने विषय के सम्बन्ध क्या देखा? कौन से रंग, संरचना, अंतर्विरोध, गति, दिशा, प्रवाह, मात्रा, परिमाण, गंध आदि तथा अपनी अनुभूति को आप कैसे सही-सही अभिव्यक्त कर सकते हैं?

७. वर्णनात्मक नहीं दृश्यात्मक  

हाइकु-लेखन वस्तुनिष्ठ अनुभव के पलों का अभिव्यक्तिकरण है न की उन घटनाओं का आत्मपरक या व्यक्तिपरक विश्लेषण या व्याख्या।  हाइकू लेखन के माध्यम से पाठक/श्रोता को घटित का वास्तविक साक्षात कराना अभिप्रेत है न कि यह बताना कि घटना से आपके मन में  क्या भावनाएं उत्पन्न हुईं। घटना की छवि से पाठक / श्रोता को उसकी अपनी भावनाएँ अनुभव करने दें. अतिसूक्ष्म, न्यूनोक्ति (घटित को कम कर कहना) छवि का प्रयोग करें। यथा: ग्रीष्म पर केंद्रित होने के स्थान पर सूर्य के झुकाव या वायु के भारीपन पर प्रकाश डालें। घिसे-पिटे शब्दों या पंक्तियों जैसे अँधेरी तूफानी रात आदि का उपयोग न कर पाठक / श्रोता को उसकी अपनी पर्यवेक्षण  उपयोग करने दें. वर्ण्य छवि के माध्यम से मौलिक, अन्वेषणात्मक भाषा / शंब्दों की तलाश कर अपना आशय सम्प्रेषित करें। इसका  आशय यह नहीं है कि शब्दकोष लेकर अप्रचलित शब्द खोजकर प्रयोग करें अपितु अपने जो देखा और जो आप दिखाना चाहते हैं उसे अपनी वास्तविक भाषा में स्वाभाविकता से व्यक्त करें।

८. प्रेरित हों: महान हाइकुकारों की परंपरा प्रेरणा हेतु बाह्य भ्रमण करना है. अपने चतुर्दिक पदयात्रा करें और परिवेश से समन्वय स्थापित करें ताकि परिवेश अपनी सीमा से बाहर आकर आपसे बात करता प्रतीत हो । 

आज करे सो अब: कागज़-कलम अपने साथ हमेशा रखें ताकि पंक्तियाँ जैसे ही उतरें, लिख सकें। आप कभी पूर्वानुमान नहीं कर सकते कि कब जलधारा में पाषाण का कोई दृश्य, सुरंग पथ पर फुदकता चूहा या सुदूर पहाड़ी पर बादलों की टोपी आपको हाइकू लिखने के लिये प्रेरित कर देगी।               
पढ़िए-बढ़िए: अन्य हाइकुकारों के हाइकू पढ़िए। हाइकु के रूप विधान  की स्वाभाविकता, सरलता, सहजता तथा सौंदर्य ने  विश्व की अनेक भाषाओँ में सहस्त्रोंको लिखने की प्रेरणा दी हैअन्यों के हाइकू पढ़ने से आपके अंदर छिपी प्रतिभा स्फुरित तथा गतिशील हो सकती है

९. अभ्यास: किसी भी अन्य कला की तरह ही हाइकू लेखन कला भी आते-आते ही  आती है. सर्वकालिक महानतम हाइकुकार बाशो के अनुसार हर हाइकु को हजारों बार जीभ पर दोहराएं, हर हाइकू को कागज लिखें, लिखें और फिर-फिर लिखें जब तक कि उसका निहितार्थ स्पष्ट न हो जाए. स्मरण रहे कि आपको ५-७-५ सिलेबल के बंधन में कैद नहीं होना है. वास्तविक साहित्यिक हाइकु में 'किगो'  द्विभागी सन्निकट संरचना और प्राथमिक तौर पर संवादी छवि होती ही है.  

१०. संवाद: हाइकू के गंभीर और सच्चे अध्येता हेतु  विश्व की विविध भाषाओँ के हाइकुकारों के विविध मंचों, समूहों, संस्थाओं और पत्रिकाओं से जुड़ना आवश्यक है ताकि वे अधुनातन हाइकु शिल्प और शैली के विषय में अद्यतन जानकारी पा सकें।    

मंगलवार, 20 मई 2014

chhand salila: roopmala chhand -sanjiv


छंद सलिला:   ​​​

रूपमाला  छंद ​

संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति अवतारी, प्रति चरण मात्रा २४ मात्रा, यति चौदह-दस, पदांत गुरु-लघु (जगण) 


लक्षण छंद:
  रूपमाला रत्न चौदह, दस दिशा सम ख्यात
  कला गुरु-लघु रख चरण के, अंत उग प्रभात
  नाग पिंगल को नमनकर, छंद रचिए आप्त 
  नव रसों का पान करिए, ख़ुशी हो मन-व्याप्त 
 
उदाहरण: 
१. देश ही सर्वोच्च है- दें / देश-हित में प्राण 
    जो- उन्हीं के योग से है / देश यह संप्राण
    करें श्रद्धा-सुमन अर्पित / यादकर बलिदान
    पीढ़ियों तक वीरता का / 'सलिल'होगा गान

२. वीर राणा अश्व पर थे, हाथ में तलवार 
    मुगल सैनिक घेर करते, अथक घातक वार
    दिया राणा ने कई को, मौत-घाट उतार 

    पा न पाये हाय! फिर भी, दुश्मनों से पार 
    ऐंड़ चेटक को लगायी, अश्व में थी आग 
    प्राण-प्राण से उड़ हवा में, चला शर सम भाग 
    पैर में था घाव फिर भी, गिरा जाकर दूर 
    प्राण त्यागे, प्राण-रक्षा की- रुदन भरपूर 
    किया राणा ने, कहा: 'हे अश्व! तुम हो धन्य 
    अमर होगा नाम तुम हो तात! सत्य अनन्य। 
                  
                              *********  
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, शोभन, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

रविवार, 18 मई 2014

chhand salila: shobhan / sinhika chhand -sanjiv


छंद सलिला:   ​​​
 
शोभन / सिंहिका  छंद ​

संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति अवतारी, प्रति चरण मात्रा २४ मात्रा, यति चौदह-दस, पदांत लघु-गुरु-लघु (जगण) 

लक्षण छंद:
  जनमत का जयघोष सुनें, नेता हो चुप आज
  चौदह विद्या दसों कला, सजे सिर पर ताज
 
उदाहरण:  १. गहन तिमिर पश्चात हुआ, नील नभ रतनार
  नववधु ऊषा लाल हुई, सूर्य पर दिल हार
  छाया सौतन द्वेष करे, हृदय में रख डाह
  लख सोलह सिंगार हुई, राख के सम स्याह 


२. पराजित होकर हुए, नेता विकल मौन
    जनशक्ति की अनुभूति कर, हाय! बेबस मौन  
    आज सच को भूलना मत, 'सलिल' मत कर माफ़

    दुबारा अवसर न देना, रहे निज मन साफ़ 

३. हिन्द सा जग में न कोई, अन्य पावन देश 
   समर्पित हों देश के प्रति, खास- आम विशेष
   परिश्रम निश-दिन करें हम, रहे कसर न लेश
   नित नयी मंज़िल छुएँ मिल, लक्ष्य वर अशेष                  
                              *********  
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, शोभन, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

chhand salila: rasaal / sumitra chhand -sanjiv


छंद सलिला:   ​​​

रसाल / सुमित्र छंद ​

संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति अवतारी, प्रति चरण मात्रा २४ मात्रा, यति दस-चौदह, पदारंभ-पदांत लघु-गुरु-लघु.  


लक्षण छंद:
   रसाल चौदह--दस/ यति, रख जगण पद आद्यंत
  बने सुमि/त्र ही स/दा, 'सलिल' बने कवि सुसंत 

उदाहरण: 
१. सुदेश बने देश / ख़ुशी आम को हो अशेष 
   सभी समान हों न / चंद आदमी हों विशेष
   जिन्हें चुना 'सलिल' व/ही देश बनायें महान
   निहाल हो सके स/मय, देश का सुयश बखान  

२. बबूल का शूल न/हीं, मनुज हो सके गुलाब 
    गुनाह छिप सके न/हीं, पुलिस करे बेनकाब
    सियासत न मलिन र/हे, मतदाता दें जवाब

    भला-बुरा कौन-क/हाँ, जीत-हार हो हिसाब  

  ३. सुछंद लय प्रवाह / हो, कथ्य अलंकार भाव
    नये प्रतीक-बिम्ब / से, श्रोता में जगे चाव
    बहे ,रसधार अमि/त, कल्पना मौलिक प्रगाढ़ 
    'सलिल' शब्द ललित र/हें, कालजयी हो प्रभाव                   
                              *********
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)
 

शनिवार, 17 मई 2014

chitr-chitr kavita: -sanjiv

चित्र-चित्र कविता:
संजीव
 *

फ़ोटो: Thanks for the add me.

मेरे मन में कौन बताये कितना दिव्य प्रकाश है?
नयन मूँदकर जब-जब देखा, ज्योति भरा आकाश है.
चित्र गुप्त साकार दिखे शत, कण-कण ज्योतित दीप दिखा-
गत-आगत के गहन तिमिरमें, सत-शिव-सुंदर आज दिपा।
*


हार गया तो क्या गम? मन को शांत रखूँ
जीत चख चुका, अब थोड़ी सी हार चखूँ
फूल-शूल जो जब पाऊँ, स्वीकार सकूँ
प्यास बुझाकर भावी 'सलिल' निहार सकूँ
*


भटका दिन भर थक गया, अब न भा रही भीड़
साँझ कहे अब लौट चल, राह हेरता नीड़
*


समय की बहती नदी पर, रक्त के हस्ताक्षर
किये जिसने कह रहा है, हाय खुद को साक्षर
ढाई आखर पढ़ न पाया, स्याह कर दी प्रकृति ही-
नभ धरा तरु नेह से, रहते न कहना निरक्षर

*

(निलं मिश्रा जी)
खों रहे क्या कुछ भविष्य में, जो चाहेंगे पा जायेंगे
नेह नर्मदा नयन तुम्हारे, जीवन -जय गायेंगे
*  


(शानू)
दीखता है साफ़-साफ़, समय नहीं करे माफ़
जो जैसा स्वीकारूँ, धूप-छाँव हाफ़-हाफ़
गिर-उठ-चल मुस्काऊँ, कुछ नवीन रच जाऊँ-
समय हँसे देख-देख, अधरों पर मधुर लाफ.
*

(रघुविंदर यादव)
लाख आवरण ओढ़ रहे हो, मैं नज़रों से देख पा रहा
क्या-क्या मन में भाव छिपाये?, कितना तुमको कौन भा रहा?
पतझर काँटे धूल साथ ले, सावन-फागुन की अगवानी-
करता रहा मौन रहकर नित, गीत बाँटकर प्रीत पा रहा.
*

(सिया कुमार)
मौन भले दिखता पर मौन नहीं होता मन.
तन सीमित मन असीम, नित सपने बोता मन.
बेमन स्वीकार या नकार नहीं भाता पर-
सच है खुद अपना ही सदा नहीं होता मन.
*
वोट चोट करता 'सलिल', देख-देखकर खोट
जो कल थे इतरा रहे, आज रहे हैं लोट
जिस कर ने पायी ध्वजा, सम्हल बढ़ाये पैर
नहीं किसी का सगा हो, समय न करता बैर
*

*इंदु सिंह(
तेरे नयनों की रामायण, बाँच रही मैं रहकर मौन
मेरे नयनों की गीता को, पढ़ पायेगा बोलो कौन?
नियति न खुलकर सम्मुख आती, नहीं सदा अज्ञात रहे-
हो सामर्थ्य नयन में झाँके बिना नयन कुछ बात कहे.

गुरुवार, 15 मई 2014

sadesh: hindi par garv karen

सन्देश; हिंदी पर गर्व करें

सन्देश; हिंदी पर गर्व करें, न बोल सकें तो शर्म

chhand salila; kavya chhand -sanjiv


छंद सलिला:   ​​​

काव्य छंद ​

संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति अवतारी, प्रति चरण मात्रा २४ मात्रा, यति ग्यारह-तेरह, मात्रा बाँट ६+४+४+४+६, हर चरण में ग्यारहवीं मात्रा लघु

लक्षण छंद:
   काव्य छंद / चौबी/, कला / ग्यारह/-तेर हो
   रखें कला / लघु रू/द्र, षट क/ली आ/दि-अं हो 
   मध्य चतुष्/कल ती/, द्विमा/ता क/र्मदे वत 
   अवतारी / की सुं/,र छवि / लख शं/का क मत  
(संकेत: रूद्र = ग्यारह, द्विमाता कर्मदेव = नंदिनी-इरावती तथा चित्रगुप्त)  

उदाहरण:  १. चमक-दमक/कर दिल / हला/ती बिज/ली गिकर
   दादुर ना/चे उछ/-कूद/कर, मट/क-मटकर
   सनन-सनन / सन पव/ खेल/ता मच/ल-मचकर
   ढाँक सूर्य / को मे/ अकड़/ता गर/ज-गरकर      

२. अमन-चैन / की है / लाश / दुनिया / में सको
    फिर भी झग/ड़े-झं/ट घे/रे हैं / जन-ज को
    लोभ--मोह / माया-/मता / बेढब / चक्क है

    हर युग में /परमा/र्थ-स्वार्थ / की ही /टक्क है 

   ३. मस्जिद-मं/दिर ध/र्म-कर्म / का म/र्म न सझे 
    रीति-रिवा/ज़ों में / हते / हैं हर/दम उझे
    सेवा भू/ले पथ / नको / मेवा / का रुता
    लालच ने / मोहा,/ तिल भर / भी त्या/ग न दिता                    
                              *********

(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, राजीव, राधिका, रामा, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सुखदा, सुगति, सुजान, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

chhand salila: vastuvadnak chhand -sanjiv


छंद सलिला:   ​​​

वस्तुवदनक छंद ​

संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति अवतारी, प्रति चरण मात्रा २४ मात्रा, पदांत चौकल-द्विकल

लक्षण छंद:
  
वस्तुवदनक कला चौबिस चुनकर रचते कवि
   पदांत चौकल-द्विकल हो तो शांत हो मन-छवि      
उदाहरण:

१. 
प्राची पर लाली झलकी, कोयल कूकी / पनघट / पर 
    रविदर्शन कर उड़े परिंदे, चहक-चहक/कर नभ / पर
    कलकल-कलकल उतर नर्मदा, शिव-मस्तक / से भू/पर 
    पाप-शाप से मुक्त कर रही, हर्षित ऋषि / मुनि सुर / नर      
 
२. मोदक लाईं मैया, पानी सुत / के मुख / में 
    आया- बोला: 'भूखा हूँ, मैया! सचमुच में'
    ''खाना खाया अभी, अभी भूखा कैसे?
    मुझे ज्ञात है पेटू, राज छिपा मोदक में''
  
३. 'तुम रोओगे कंधे पर रखकर सिर?  
    सोचो सुत धृतराष्ट्र!, गिरेंगे सुत-सिर कटकर''
    बात पितामह की न सुनी, खोया हर अवसर
    फिर भी
दोष भाग्य को दे, अंधा रो-रोकर                    *********

(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, राजीव, राधिका, रामा, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सुखदा, सुगति, सुजान, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)
 
 

बुधवार, 14 मई 2014

chhand salila: saaras chhand -sanjiv


छंद सलिला:   ​​​

सारस /  छंद ​

संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति अवतारी, प्रति चरण मात्रा २४ मात्रा, यति १२-१२, चरणादि विषमक़ल तथा गुरु, चरणांत लघु लघु गुरु  (सगण) सूत्र- 'शांति रखो शांति रखो
शांति रखो शांति रखो'
विशेष: साम्य- उर्दू बहर 'मुफ़्तअलन मुफ़्तअलन मुफ़्तअलन मुफ़्तअलन' 

लक्षण छंद:
  
सारस मात्रा गुरु हो, आदि विषम ध्यान रखें 
   बारह-बारह यति गति, अन्त सगण जान रखें      
उदाहरण:

१.  सूर्य कहे शीघ्र उठें,
भोर हुई सेज तजें
    दीप जला दान करें, राम-सिया नित्य भजें 
    शीश झुका आन बचा, मौन रहें राह चलें
    साँझ हुई काल कहे, शोक भुला आओ ढलें
    
 
२. पाँव उठा गाँव चलें, छाँव मिले ठाँव करें 
    आँख मुँदे स्वप्न पलें, बैर भुला मेल करें
    धूप कड़ी झेल सकें, मेह मिले खेल
करें
    ढोल बजा नाच सकें, बाँध भुजा पीर हरें
  
३. क्रोध न हो द्वेष न हो, बैर न हो भ्रान्ति तजें 
    चाह करें वाह करें, आह भरें शांति भजें
    नेह रखें प्रेम करें, भीत न हो कांति वरें
    आन रखें मान रखें, शोर न हो क्रांति करें


                   *********

(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, राजीव, राधिका, रामा, लीला, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सुखदा, सुगति, सुजान, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

मंगलवार, 13 मई 2014

geet: god mere! -sanjiv

अभिनव प्रयोग:
गीत
वात्सल्य का कंबल
संजीव
*
गॉड मेरे! सुनो प्रेयर है बहुत हंबल
कोई तो दे दे हमें वात्सल्य का कंबल....
*
अब मिले सरदार सा सरदार भारत को
अ-सरदारों से नहीं अब देश गारत हो
असरदारों की जरूरत आज ज़्यादा है
करे फुलफिल किया वोटर से जो वादा है
एनिमी को पटकनी दे, फ्रेंड को फ्लॉवर
समर में भी यूँ लगे, चल रहा है शॉवर
हग करें क़ृष्णा से गंगा नर्मदा चंबल
गॉड मेरे! सुनो प्रेयर है बहुत हंबल
कोई तो दे दे हमें वात्सल्य का कंबल....
*
मनी फॉरेन में जमा यू टर्न ले आये
लाहौर से ढाका ये कंट्री एक हो जाए
दहशतों को जीत ले इस्लाम, हो इस्लाह
हेट के मन में भरो लव, ​शाह के भी शाह  
कमाई से खर्च कम हो, हो न सिर पर कर्ज

यूथ-प्रायरटी न हो मस्ती, मिटे यह मर्ज
एबिलिटी ही हो हमारा,ओनली संबल
 गॉड मेरे! सुनो प्रेयर है बहुत हंबल
कोई तो दे दे हमें वात्सल्य का कंबल....
*
 
कलरफुल लाइफ हो, वाइफ पीसफुल हे नाथ!  
राजमार्गों से मिलाये हाथ हँस फुटपाथ  
रिच-पुअर को क्लोद्स पूरे गॉड! पहनाना
चर्च-मस्जिद को गले, मंदिर के लगवाना
फ़िक्र नेचर की बने नेचर, न भूलें अर्थ
भूल मंगल अर्थ का जाएँ न मंगल व्यर्थ 
करें लेबर पर भरोसा, छोड़ दें गैंबल
 गॉड मेरे! सुनो प्रेयर है बहुत हंबल
कोई तो दे दे हमें वात्सल्य का कंबल....
*   
 

(इस्लाम = शांति की चाह, इस्लाह = सुधार)

chhand salila: dikpaal / mridugati chhand -sanjiv


छंद सलिला:   ​​​

दिक्पाल / मृदुगति छंद ​

संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति अवतारी, प्रति चरण मात्रा २४ मात्रा, यति १२-१२, चरणांत गुरु  (यगण, मगण, रगण, सगण)

लक्षण छंद:
  
मृदुगति दिक्पाल चले / सूर्यदेव विहँस ढले
   राशि-मास गति-यति बन / अवतारी संग भले
     
उदाहरण:

१. 
'असुरों का अंत करें / आओ!' कहा रामने  
    धनुष उठा लखन चले / कौन आये सामने
    तीर चले लक्ष भेद / अरि का हृदय थामने
    दिल दहले रिपुदलके / सुकाम किया नामने 

    शौर्य-कथा नयी लिखी / 'जूझो' कहा शामने 
    'त्राहि माम, शरणागत' / बचा लिया प्रणाम ने
    
 
२. बैठ फूलपर तितली / रस पीती उड़ जाती
    भँवरा गाता गाना / उसको धता बताती
    नन्हें-मुन्ने बच्चों / के मन बेहद भाती
    काँटों से बच रहती / कलियों सँग मुस्काती
 
३. भूतनाथ तप ऱत थे / दशकंधर देख मौन 
    भुजमें कितना बल है ? बता सके कहो कौन?
    निज परिचय देता हूँ / सोचा कैलाश उठा
    'अहंकार दूर करो' शिवा कहें शीश झुका

    पद का अंगुष्ठ दबा / शिवजी ने मोद किया
    आर्तनाद कर रावण / चीख उठा, कँपा जिया
                   *********

(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, राजीव, राधिका, रामा, लीला, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, सरस, सार, सिद्धि, सुखदा, सुगति, सुजान, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी) 



सोमवार, 12 मई 2014

chhand salila: sukhda chhand -sanjiv


छंद सलिला:   ​​​

सुखदा छंद ​

संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति महारौद्र, प्रति चरण मात्रा २२ मात्रा, यति १२-१०, चरणांत गुरु  (यगण, मगण, रगण, सगण)

लक्षण छंद:
   सुखदा बारह-दस यति, मन की बात कहे
   गुरु से करें पद-अंत, मंज़िल निकट रहे
     
उदाहरण:

१. 
नेता भ्रष्ट हुए जो / उनको धुनना है
    जनसेवक जो सच्चे / उनको सुनना है
    सोच-समझ जनप्रतिनिधि, हमको चुनना है
    शुभ भविष्य के सपने, उज्ज्वल बुनना है
    
 
२. कदम-कदम बढ़ना है / मंज़िल पग चूमे
    मिल सीढ़ी चढ़ना है, मन हँसकर झूमे
    कभी नहीं डरना है / मिल मुश्किल जीतें
    छंद-कलश छलकें / 'सलिल' नहीं रीतें

 
३. राजनीति सुना रही / स्वार्थ क राग है 
    देश को झुलसा रही, द्वेष की आग है
    नेतागण मतलब की , रोटियाँ सेंकते
    जनता का पीड़ा-दुःख / दल नहीं देखता

                   *********

(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि,
निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, योग, ऋद्धि, रसामृत, राजीव, राधिका, रामा, लीला, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, सरस, सार, सिद्धि, सुखदा, सुगति, सुजान, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

muktak salila: dil -sanjiv

मुक्तक सलिला:
दिल ही दिल
संजीव
*
तुम्हें देखा, तुम्हें चाहा, दिया दिल हो गया बेदिल
कहो चाहूँगा अब कैसे, न होगा पास में जब दिल??
तुम्हें दिलवर कहूँ, तुम दिलरुबा, तुम दिलनशीं भी हो
सनम इंकार मत करना, मिले परचेज का जब बिल
*
न देना दिल, न लेना दिल, न दिलकी डील ही करना
न तोड़ोगे, न टूटेगा, नहीँ कुछ फ़ील ही करना
अभी फर्स्टहैंड है प्यारे, तुम  सैकेंडहैंड मत करना
न दरवाज़ा खुल रख्नना, न कोई दे सके धऱना
*
न दिल बैठा, न दिल टूटा, न दहला दिल, कहूँ सच सुन
न पूछो कैसे दिल बहला?, न बोलूँ सच , न झूठा सुन,
रहे दिलमें  अगर दिलकी, तो दर्दे-दिल नहीं होगा
कहो संगदिल भले ही तुम, ये दिल कातिल नहीँ होगा
*
लगाना दिल न चाहा, दिल लगा कब? कौन बतलाये??
सुनी दिल की, कही दिल से, न दिल तक बात जा पाये।
ये दिल भाया है जिसको, उसपे  क्यों ये दिल नहीं आया?
ये दिल आया है जिस पे, हाय! उसको दिल नहीं भाया।
***

chhand salila: nishchal chhand -sanjiv


छंद सलिला:   ​​​

निश्चल छंद ​

संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति रौद्राक, प्रति चरण मात्रा २३ मात्रा, यति १६-७, चरणांत गुरु लघु (तगण, जगण)

लक्षण छंद:
   कर सोलह सिंगार, केकसी / पाने जीत
   सात सुरों को साध, सुनाये / मोहक गीत
   निश्चल ऋषि तप छोड़, ऱूप पर / रीझे आप 
   संत आसुरी मिलन, पुण्य कम / ज्यादा पाप
   
उदाहरण:

१.  अक्षर-अक्षर जोड़ शब्द हो / लय मिल छंद 

    अलंकार रस बिम्ब भाव मिल / दें आनंद
    काव्य सारगर्भित पाठक को / मोहे खूब
    वक्ता-श्रोता कह-सुन पाते / सुख में डूब
 
२. माँ को करिए नमन, रही माँ / पूज्य सदैव
    मरुथल में आँचल की छैंया / बगिया दैव 

    पाने माँ की गोद तरसते / खुद भगवान
    एक दिवस क्या, कर जीवन भर / माँ का गान 

 
३. मलिन हवा-पानी, धरती पर / नाचे मौत
    शोर प्रदूषण अमन-चैन हर / जीवन-सौत
    सर्वाधिक घातक चारित्रिक / पतन न भूल
    स्वार्थ-द्वेष जीवन-बगिया में / चुभते शूल

                   *********

(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि,
निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, योग, ऋद्धि, रसामृत, राजीव, राधिका, रामा, लीला, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, सरस, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

शनिवार, 10 मई 2014

chhand salila: sujan / virahani chhand -sanjiv


छंद सलिला:   ​​​

सुजान / विरहणी छंद ​

संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति रौद्राक, प्रति चरण मात्रा २३ मात्रा, यति १४-९, चरणांत गुरु लघु (तगण, जगण)

लक्षण छंद:
   बनिए सुजान नित्य तान / छंद का वितान
   रखिए भुवन-निधि अंत में / गुरु-लघु पहचान
   तजिए न आन रीति जान / कर्म कर महान
   करिए निदान मीत ठान / हो नया विहान 
   
उदाहरण:

१.  प्रभु चित्रगुप्त निराकार / होते साकार
    कण-कण में आत्म रूप हैं, देव निराकार 

    अक्षर अनादि शब्द ब्रम्ह / सृजें काव्य धार
    कथ्य लय ऱस बिम्ब सोहें / सजे अलंकार
 
२. राम नाम ही जगाधार / शेष सब असार
    श्याम नाम ही जप पुकार / बाँट 'सलिल' प्यार 

    पुरुषार्थ-भाग्य नीति सुमति / भवसागर पार
    करे-तरे ध्यान धरें हँस / बाँके करतार 
 
३. समय गँवा मत, काम बिना / सार सिर्फ काम 
    बिना काम सुख-चैन छिना / लक्ष्य एक काम
    काम कर निष्काम तब ही / मिल पाये नाम
    ज्यों की त्यों चादर धर जा / ईश्वर के धाम 

                   *********

(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, योग, ऋद्धि, रसामृत, राजीव, राधिका, रामा, लीला, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, सरस, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

शुक्रवार, 9 मई 2014

geet-prati geet: rakesh khandelwal-sanjiv

गीत-प्रतिगीत 
राकेश खंडेलवाल - संजीव 
*
जहाँ फ़िसलते हुए बचे थे पाँव  उम्र के उन मोड़ों पर
जमी हुई परतों में से अब प्रतिबिम्बित होती परछाईं
जहाँ मचलते गुलमोहर ने एक दिवस अनुरागी होकर
सौंपी थी प्राची को अपने संचय की पूरी अरुणाई


उसी मोड़ से गये समेटे कुछ अनचीन्हे से भावों को
मैं अपनी एकाकी संध्याओं में नित टाँका करता हूँ
*
अग्निलपट सिन्दूर चूनरी, मंत्र और कदली स्तंभों ने
जिस समवेत व्यूह रचना के नये नियम के खाके खींचे
उससे जनित कौशलों के अनुभव ने पथ को चिह्नित कर कर
जहाँ जहाँ विश्रान्ति रुकी थी वहीं वहीं पर संचय सींचे


निर्निमेष हो वही निमिष अब ताका करते मुझे निरन्तर
और खोजने उनमें उत्तर मैं उनको ताका करता हूँ


षोडस सोमवार के व्रत ने दिये पालकी को सोलह पग
था तुलसी चौरे का पूजन ,गौरी मन्दिर का आराधन
खिंची हाथ की रेखाओंका लिखा हुआ था घटित वहाँ पर
जबकि चुनरिया पआंखों में आ आ कर उतरा था सावन


हो तो गया जिसे होना था, संभव नहींनहीं हो पाता
उस अतीत के वातायन में, मैं अब भी झाँका करता हूँ


तय कर चुका अकल्पित दूरी कालचक्र भी चलते चलते
जहाँ आ गया पीछे का कुछ दृश्य नहीं पड़ता दिखलाई
फ़िर भी असन्तुष्ट इस मन की ज़िद है वापिस लौटें कुछ पल
वहाँ, जहाँ पर धानी कोई किरण एक पल थी लहराई


इस स्थल से अब उस अमराई की राहों को समय पी गया
मैं फ़िर भी तलाश थामे पथ की सिकता फ़ाँका करता हूँ
____________
गीत
*
अटल सत्य गत-आगत फिसलन-मोड़ मिलाएंगे फ़िर हमको

किसके नयनों में छवि किसकी कौन बताये रही समाई 
वहीं सृजन की रची पटकथा  विधना ने चुपचाप हुलसकर
संचय अगणित गणित हुआ ज्यों ध्वनि ने प्रतिध्वनि थी लौटाई

मौन मगन हो सतनारायण के प्रसाद में मिली पँजीरी
अँजुरी में ले बुक्का भर हो आनंदित फाँका करता हूँ
*
खुदको तुममें गया खोजने जब तब पाया खुदमेँ तुमको
किसे ज्ञात कब तुम-मैं हम हो सिहर रहे थे अँखियाँ मीचे
बने सहारा जब चाहा तब अहम सहारा पा नतमस्तक
हुआ और भर लिया बाँह में खुदको खुदने उठ-झुक नीचे

हो अवाक मन देख रहा था कैसे शून्य सृष्टि रचता है
हार स्वयं से, जीत स्वयं को नव सपने आँका करता हूँ
*
चमका शुक्र हथेली पर हल्दी आकर चुप हुई विराजित
पुरवैया-पछुआ ने बन्ना-बन्नी गीत सुनाये भावन
गुण छत्तीस मिले थे उस पल, जिस पल पलभर नयन मिले थे
नेह नर्मदा छोड़ मिली थी, नेह नर्मदा मन के आँगन 

पाकर खोना, खोकर पाना निमिष मात्र में जान मनीषा
मौन हुई, विश्वास सितारे मन नभ पर टाँका करता हूँ
*
आस साधना की उपासना करते उषा हुई है संध्या
रजनी में दोपहरी देखे चाहत, राहत हुई पराई
मृगमरीचिका को अनुरागा, दौड़ थका तो भुला विकलता
मन देहरी सँतोष अल्पना की कर दी हँसकर कुड़माई

सुधियों के दर्पण में तुझको, निरखा थकन हुई छूमंतर
कलकल करती 'सलिल'-लहर में, छवि तेरी झाँका करता हूँ
*

गुरुवार, 8 मई 2014

chhand salila: sampada chhand -sanjiv


छंद सलिला:   ​​​


संपदा छंद

संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति रौद्राक, प्रति चरण मात्रा २३ मात्रा, यति १

​१-१२, चरणांत लघु गुरु लघु (जगण/पयोधर)

लक्षण छंद: 
   शक्ति-शारदा-रमा / मातृ शक्तियाँ सप्राण
​   
   सदय हुईं मनुज पर / पीड़ा से मुक्त प्राण
   मधुर छंद संपदा / अंत जगण का प्रसाद
​   
   ग्यारह-बारह सुयति / भाव सरस लय निनाद ​

 
​ ​
 

उदाहरण:
१.  मीत! गढ़ें नव रीत / आओ! करें शुचि प्रीत
    मौन न चाहें और / गायें मधुरतम गीत
    मन को मन से जोड़ / समय से लें हम होड़
    दुनिया माने हार / सके मत लेकिन तोड़  

 
२. जनता से किया जो / वायदा न भूल आज
    खुद ही बनाया जो / कायदा न भूल आज
    जनगण की चाह जो / पूरी कर वाह वाह
    हरदम हो देश का / फायदा न भूल आज
 
 
३. मन मसोसना न मन / जो न सही, वह न ठान
    हैं न जन जो सज्जन / उनको मत मीत मान
    धन-पद-बल स्वार्थ का / कलम कभी कर न गान-
    निर्बल के परम बल / राम सत्य 'सलिल' मान.  
 
                    *********  
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, योग, ऋद्धि, रसामृत, राजीव, राधिका, रामा, लीला, वाणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, सरस, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)
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puja geet: ravindra nath thakur

बाङ्ग्ला-हिंदी भाषा सेतु:

पूजा गीत

रवीन्द्रनाथ ठाकुर

*

जीवन जखन छिल फूलेर मतो

पापडि ताहार छिल शत शत।

बसन्ते से हत जखन दाता

रिए दित दु-चारटि  तार पाता,

तबउ जे तार बाकि रइत कत

आज बुझि तार फल धरेछे,

ताइ हाते ताहार अधिक किछु नाइ।

हेमन्ते तार समय हल एबे

पूर्ण करे आपनाके से देबे

रसेर भारे ताइ से अवनत। 

*

पूजा गीत:  रवीन्द्रनाथ ठाकुर

हिंदी काव्यानुवाद : संजीव 



फूलों सा खिलता जब जीवन

पंखुरियां सौ-सौ झरतीं।

यह बसंत भी बनकर दाता 

रहा झराता कुछ पत्ती।

संभवतः वह आज फला है 

इसीलिये खाली हैं हाथ।

अपना सब रस करो निछावर

हे हेमंत! झुककर माथ।

*

सोमवार, 5 मई 2014

geet: sanjiv

गीत:
संजीव
*
आन के स्तन न होते, किस तरह तन पुष्ट होता
जान कैसे जान पाती, मान कब संतुष्ट होता?
*
पय रहे पी निरन्तर विष को उगलते हम न थकते
लक्ष्य भूले पग भटकते थक गये फ़िर भी न थकते
मौन तकते हैं गगन को कहीँ क़ोई पथ दिखा दे
काश! अपनापन न अपनोँ से कभी भी रुष्ट होता
*
पय पिया संग-संग अचेतन को मिली थी चेतना भी
पयस्वनि ने कब बतायी उसे कैसी वेदना थी?
प्यार संग तकरार या इंकार को स्वीकार करना
काश! हम भी सीख पाते तो मनस परिपुष्ट होता
*
पय पिला पाला न लेकिन मोल माँगा कभी जिसने
वंदनीया है वही, हो उऋण उससे कोई कैसे?
आन भी वह, मान भी वह, जान भी वह, प्राण भी वह
​खान ममता की न होती, दान कैसे तुष्ट होता?
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