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गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

नवगीत:

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जब तक कुर्सी.... 
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संजी
*
जब तक कुर्सी, तब तक ठाठ...
*
नाच जमूरा, नचा मदारी.
सत्ता भोग, करा बेगारी.
कोई किसी का सगा नहीं है.
स्वार्थ साधने करते यारी.
फूँको नैतिकता ले काठ.
जब तक कुर्सी, तब तक ठाठ...
*
बेच-खरीदो रोज देश को.
साध्य मान लो लोभ-ऐश को.
वादों का क्या?, किया-भुलाया.
लूट-दबाओ स्वर्ण-कैश को.
झूठ आचरण सच का पाठ.
जब तक कुर्सी, तब तक ठाठ...
*
मन पर तन ने राज किया है.
बिजली गायब बुझा दिया है.
सच्चाई को छिपा रहे हैं.
भाई-चारा निभा रहे हैं.
सोलह कहो भले हो साठ.
जब तक कुर्सी, तब तक ठाठ...
*

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