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गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

chitra par kavita -sanjiv

चित्र पर कविता:
संजीव
*

श्वास तुला है आस दण्डिका, दोनों पल्लों पर हैं श्याम
जड़ में वही समाये हैं जो खुद चैतन्य परम अभिराम
कंकर कंकर में शंकर वे, वे ही कण-कण में भगवान-
नयन मूँद, कर जोड़ कर 'सलिल', आत्मलीन हो नम्र प्रणाम
*

व्यथा--कथा यह है विचित्र हरि!, नहीं कथा सुन-समझ सके
इसीलिए तो नेता-अफसर सेठ-आमजन भटक रहे
स्वयं संतगण भी माया से मुक्त नहीं, कलिकाल-प्रभाव-
प्रभु से नहीं कहें तो कहिये व्यथा ह्रदय की कहाँ कहें?
*

सूर्य छेडता उषा को हुई लाल बेहाल
क्रोधित भैया मेघ ने दंड दिया तत्काल
वसुधा माँ ने बताया पलटा चिर अनुराग-
गगन पिता ने छुड़ाया आ न जाए भूचाल
*


सेतु दूरियों को मिटा, जोड़ किनारे मौन
जोड़-जोड़ दिल टूटते, कहिए जोड़े कौन?
*


वन काटे, पर्वत मिटा, भोग रहे अभिशाप
उफ़न-सूख नदिया कहे, बंद करो यह पाप
रूठे प्रभु केदार तो मनुज हुआ बेज़ार-
सुधर न पाया तो असह्य, होगा भू का ताप
*

मोहन हो गोपाल भी, हे जसुदा के लाल!
तुम्हीं वेणुधर श्याम हो, बाल तुम्हीं जगपाल
कमलनयन श्यामलवदन, माखनचोर मुरार-
गिरिधर हो रणछोड़ भी, कृष्ण कान्ह इन्द्रारि।
*

हममें प्रभु का वास है, भूल रहे क्यों काट?
याद रखो हो रही है, खड़ी तुम्हारी खाट
वृक्ष बिना दे ओषजन, कौन तुम्हें बिन दाम?
मिटा वंश, है शाप यह, वंशज आये न काम
मुझ जैसे तुम अकेले, पा न सकोगे चैन
छाँह न बाकी रहेगी, रोओगे दिन-रैन
*

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