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शनिवार, 26 अप्रैल 2014

doha salila: sanjiv

दोहा सलिला:
संजीव
*
राधा मीरा द्रौपदी, किसको कितना नेह
कृष्ण-सखा से किस तरह, जाने बिन संदेह
*
किसका है कुल श्रेष्ठ- यह, सका तभी जग जान?
जब तम हर लायी निशा , निर्मल नवल विहान।
*
धूप-छाँव जब जो मिल, किया विहँस स्वीकार
अधर मुस्कुराते रहे, कह प्रभु को आभार
*
तन-मन की भाषा नहीं, है दिमाग के पास
दिल की सुनिए तो नहीं, होंगे आप उदास.
*
खाली होता उदर तो, खुल जाती है आँख
उदर भरे तो पखेरू, क़ब फ़ैलाते पाँख
*
अधर बन्द कर मौन हो, करिए कविता-पाठ
मन की मन से मन कहे, बात- अजब हो ठाठ
*

गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

chitr par kavita -sanjiv

​चित्र पर कविता
संजीव
*


भगा साथियों को दिया, किन्तु न भागा आप
मधुर-मधुर मुस्कान से, हर मैया का ताप
कान खिंचा मुस्का रहा, ब्रिज का माखनचोर
मैया भूली डाँटना, होकर भाव विभोर
*
अग्निहोत्र नभ ने किया, साक्षी देते मेघ
मिलीं लालिमा-कालिमा, गले भूलकर भेद
आया आम चुनाव क्या?, केर-बेर का संग
नित नव गठबंधन करे, खिले नये गुल-रंग
*
फेरे सात लगा लिये, कदम-कदम रख साथ
कर आये मतदान भी, लिए हाथ में हाथ
करते हैं संकल्प यह, जब भी हों मतभेद
साथ बैठ सुलझाएँगे, 'सलिल' न हो मनभेद
*



मुस्कुराती रहो, खिलखिलाती रहो,
पंछियों की तरह गीत गाती रहो
जो तुम्हें भा रहा, है दुआ यह मेरी-
तुम भी उसको सदा खूब भाती रहो
*
facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil'

शुक्रवार, 28 मार्च 2014

lekh: doha-doha kavya ras -sanjiv

  विशेष आलेख 

दोहा दोहा काव्य रस   

संजीव 

दोहा भास्कर काव्य नभ, दस दिश रश्मि उजास ‌
गागर में सागर भरे, छलके हर्ष हुलास ‌ ‌
रस, भाव, संधि, बिम्ब, प्रतीक, शैली, अलंकार आदि काव्य तत्वों की चर्चा करने का उद्देश्य यह है कि दोहों में इन तत्वों को पहचानने और सराहने के साथ दोहा रचते समय इन तत्वों का यथोचित समावेश कर किया जा सके। ‌
रसः 
काव्य को पढ़ने या सुनने से मिलनेवाला आनंद ही रस है। काव्य मानव मन में छिपे भावों को जगाकर रस की अनुभूति कराता है। भरत मुनि के अनुसार "विभावानुभाव संचारी संयोगाद्रसनिष्पत्तिः" अर्थात् विभाव, अनुभाव व संचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। रस के ४ अंग स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव व संचारी भाव हैं-
स्थायी भावः मानव ह्र्दय में हमेशा विद्यमान, छिपाये न जा सकनेवाले, अपरिवर्तनीय भावों को स्थायी भाव कहा जाता है।
रस:  १. श्रृंगार, २. हास्य, ३. करुण, ४. रौद्र, ५. वीर, ६. भयानक, ७. वीभत्स,  ८. अद्भुत, ९. शांत,  १०. वात्सल्य, ११. भक्ति।
क्रमश:स्थायी भाव: १. रति, २. हास, ३. शोक, ४. क्रोध, ५. उत्साह, ६. भय, ७. घृणा, ८. विस्मय,  निर्वेद, ९.  १०. संतान प्रेम, ११. समर्पण।
विभावः
किसी व्यक्ति के मन में स्थायी भाव उत्पन्न करनेवाले कारण को विभाव कहते हैं। व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति भी विभाव हो सकती है। ‌विभाव के दो प्रकार आलंबन व उद्दीपन हैं। ‌

आलंबन विभाव के सहारे रस निष्पत्ति होती है। इसके दो भेद आश्रय व विषय हैं ‌
आश्रयः 
जिस व्यक्ति में स्थायी भाव स्थिर रहता है उसे आश्रय कहते हैं। ‌श्रृंगार रस में नायक नायिका एक दूसरे के आश्रय होंगे।‌
विषयः 
जिसके प्रति आश्रय के मन में रति आदि स्थायी भाव उत्पन्न हो, उसे विषय कहते हैं ‌ "क" को "ख" के प्रति प्रेम हो तो "क" आश्रय तथा "ख" विषय होगा।‌
उद्दीपन विभाव: 
आलंबन द्वारा उत्पन्न भावों को तीव्र करनेवाले कारण उद्दीपन विभाव कहे जाते हैं। जिसके दो भेद बाह्य वातावरण व बाह्य चेष्टाएँ हैं। वन में सिंह गर्जन सुनकर डरनेवाला व्यक्ति आश्रय, सिंह विषय, निर्जन वन, अँधेरा, गर्जन आदि उद्दीपन विभाव तथा सिंह का मुँह फैलाना आदि विषय की बाह्य चेष्टाएँ हैं ।
अनुभावः 
आश्रय की बाह्य चेष्टाओं को अनुभाव या अभिनय कहते हैं। भयभीत व्यक्ति का काँपना, चीखना, भागना आदि अनुभाव हैं। ‌
संचारी भावः 
आश्रय के चित्त में क्षणिक रूप से उत्पन्न अथवा नष्ट मनोविकारों या भावों को संचारी भाव कहते हैं। भयग्रस्त व्यक्ति के मन में उत्पन्न शंका, चिंता, मोह, उन्माद आदि संचारी भाव हैं। मुख्य ३३ संचारी भाव निर्वेद, ग्लानि, मद, स्मृति, शंका, आलस्य, चिंता, दैन्य, मोह, चपलता, हर्ष, धृति, त्रास, उग्रता, उन्माद, असूया, श्रम, क्रीड़ा, आवेग, गर्व, विषाद, औत्सुक्य, निद्रा, अपस्मार, स्वप्न, विबोध, अवमर्ष, अवहित्था, मति, व्याथि, मरण, त्रास व वितर्क हैं।
रस
१. श्रृंगार 
अ. संयोग श्रृंगार:
तुमने छेड़े प्रेम के, ऐसे राग हुजूर
बजते रहते हैं सदा, तन-मन में संतूर
- अशोक अंजुम, नई सदी के प्रतिनिधि दोहाकार
आ. वियोग श्रृंगार:
हाथ छुटा तो अश्रु से, भीग गये थे गाल ‌
गाड़ी चल दी देर तक, हिला एक रूमाल
- चंद्रसेन "विराट", चुटकी चुटकी चाँदनी
२. हास्यः
आफिस में फाइल चले, कछुए की रफ्तार ‌
बाबू बैठा सर्प सा, बीच कुंडली मार
- राजेश अरोरा"शलभ", हास्य पर टैक्स नहीं
व्यंग्यः
अंकित है हर पृष्ठ पर, बाँच सके तो बाँच ‌
सोलह दूनी आठ है, अब इस युग का साँच
- जय चक्रवर्ती, संदर्भों की आग
३. करुणः
हाय, भूख की बेबसी, हाय, अभागे पेट ‌
बचपन चाकर बन गया, धोता है कप-प्लेट
- डॉ. अनंतराम मिश्र "अनंत", उग आयी फिर दूब
४. रौद्रः
शिखर कारगिल पर मचल, फड़क रहे भुजपाश ‌
जान हथेली पर लिये, अरि को करते लाश
- संजीव 
५. वीरः
रणभेरी जब-जब बजे, जगे युद्ध संगीत ‌
कण-कण माटी का लिखे, बलिदानों के गीत
- डॉ. रामसनेहीलाल शर्मा "यायावर", आँसू का अनुवाद
६. भयानकः
उफनाती नदियाँ चलीं, क्रुद्ध खोलकर केश ‌
वर्षा में धारण किया, रणचंडी का वेश
- आचार्य भगवत दुबे, शब्दों के संवाद
७. वीभत्सः
हा, पशुओं की लाश को, नोचें कौए गिद्ध ‌
हा, पीते जन-रक्त फिर, नेता अफसर सिद्ध
- संजीव
८. अद्भुतः
पांडुपुत्र ने उसी क्षण, उस तन में शत बार ‌
पृथक-पृथक संपूर्ण जग, देखे विविध प्रकार
- डॉ. उदयभानु तिवारी "मधुकर", श्री गीता मानस
९. शांतः
जिसको यह जग घर लगे, वह ठहरा नादान ‌
समझे इसे सराय जो, वह है चतुर सुजान
- डॉ. श्यामानंद सरस्वती "रौशन", होते ही अंतर्मुखी
१० . वात्सल्यः
छौने को दिल से लगा, हिरनी चाटे खाल ‌
पान करा पय मनाती, चिरजीवी हो लाल
-संजीव 
११. भक्तिः
दूब दबाये शुण्ड में, लंबोदर गजमुण्ड ‌
बुद्धि विनायक हे प्रभो!, हरो विघ्न के झुण्ड
- भानुदत्त त्रिपाठी "मधुरेश", दोहा कुंज
दोहा में हर रस को अभिव्यक्त करने की सामर्थ्य है। आशा है दोहाकार अपनी रुचि के अनुकूल खड़ी बोली या टकसाली हिंदी में दोहे रचने की चुनौती को स्वीकारेंगे। हिंदी के अन्य भाषिक रूपों यथा उर्दू, बृज, अवधी, बुन्देली, भोजपुरी, मैथिली, अंगिका, बज्जिका, छत्तीसगढ़ी, मालवी,  निमाड़ी, बघेली, कठियावाड़ी, शेखावाटी, मारवाड़ी, हरयाणवी आदि तथा अन्य भाषाओँ गुजराती, मराठी, गुरुमुखी, उड़िया, बांगला, तमिल, तेलुगु,  कन्नड़, डोगरी, असमीआदि तथा अभारतीय भाषाओँ अंग्रेजी इत्यादि में दोहा भेजते समय उसका उल्लेख किया जाना उपयुक्त होगा ताकि उस रूप / भाषा विशेष में प्रयुक्त शब्दरूप व क्रियापद को अशुद्धि न समझा जाए।
 
**********

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2014

chitr par kavita: doha : sanjiv

​
चित्र पर कविता
संजीव
*


जब कविता ही सामने, कलम लिये हो हाथ
सलिल नहीं कविता करे, यह कैसे हो नाथ?
*
प्रश्नाकुल हैं नयन पर, उत्तर हुए अशेष
खाली प्याला चाय का, कहे कहानी शेष
*
युग कागज़ को समेटे, तरुणी बनी सवाल
संसद या जम्हूरियत के जी का जंजाल?
*
कोरे कागज़ पर लिखूँ, क्या? जो दे संतोष
जिससे तनिक समृद्ध हो, सरस्वती का कोष
*
श्यामल कंगन हाथ का, युग की नज़र उतार
कहे आम को ही चुनो, ख़ास तजो इस बार
*

facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil'

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

doha salila: samyik dohe -sanjiv

सामयिक दोहे
संजीव
*
जो रणछोड़ हुए उन्हें, दिया न हमने त्याग
किया श्रेष्ठता से सदा, युग-युग तक अनुराग।
*
मैडम को अवसर मिला, नहीं गयीं क्या भाग?
त्यागा था पद अटल ने, किया नहीं अनुराग।
*
शास्त्री जी ने भी किया, पद से तनिक न मोह
लक्ष्य हेतु पद छोड़ना, नहिं अपराध न द्रोह।
*
केर-बेर ने मिलाये, स्वार्थ हेतु जब हाथ
छोड़ा जिसने पद विहँस, क्यों न उठाये माथ?
*
करते हैं बदलाव की, जब-जब भी हम बात
पूर्व मानकों से करें, मूल्यांकन क्यों तात?
*
विष को विष ही मारता, शूल निकाले शूल
समय न वह जब शूल ले, आप दीजिये फूल
*
सहन असहमति को नहीं, करते जब हम-आप
तज सहिष्णुता को 'सलिल', करें व्यर्थ संताप
**

doha salila: samyik dohe -sanjiv



सामयिक दोहे
संजीव
*
इनके पंजे में कमल, उनका भगवा हाथ
आम आदमी देखकर, नत दोनों का माथ
*
'राज्य बनाया है' कहो या 'तोडा है राज्य'
तोड़ रही है सियासत, कैसे हों अविभाज्य?
*
भाग्य विधाता आम है, शोषण करता ख़ास
जो खासों का साथ दे, उसको मानो दास
*
साथ आम का दो सलिल, उस पर कर विश्वास
साथ  ख़ास के जो रहा, वह भोगे संत्रास 
*
ख़ास हुआ है वह 'सलिल', जिसे न  भाये आम 
बेच रहा ईमान निज, जो निश-दिन ले दाम 
*
एक द्विपदी:
मिलाकर हाथ खासों ने, किया है आम को बाहर
नहीं लेना न देना ख़ास से, हम आम इन्सां हैं
*

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

doha salila: valentine -sanjiv

दोहा सलिला:
वैलेंटाइन 
संजीव
*
उषा न संध्या-वंदना, करें खाप-चौपाल
मौसम का विक्षेप ही, बजा रहा करताल
*
लेन-देन ही प्रेम का मानक मानें आप
किसको कितना प्रेम है?, रहे गिफ्ट से नाप
*
बेलन टाइम आगया, हेलमेट धर शीश
घर में घुसिए मित्रवर, रहें सहायक ईश
*
पर्व स्वदेशी बिसरकर, मना विदेशी पर्व
नकद संस्कृति त्याग दी, है उधार पर गर्व
*
उषा गुलाबी गाल पर, लेकर आई गुलाब
प्रेमी सूरज कह रहा, प्रोमिस कर तत्काल
*
धूप गिफ्ट दे धरा को, दिनकर करे प्रपोज  
देख रहा नभ मन रहा, वैलेंटाइन रोज
*
रवि-शशि से उपहार ले, संध्या दोनों हाथ
मिले गगन से चाहती, बादल का भी साथ
*
चंदा रजनी-चाँदनी, को भेजे पैगाम
मैंने दिल कर दिया है, दिलवर तेरे नाम
*
पुरवैया-पछुआ कहें, चखो प्रेम का डोज
मौसम करवट बदलता, जब-जब करे प्रपोज
*

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

DOHA SALILA: AAJ KI BAAT -SANJIV

दोहा सलिला-
आज की बात :
संजीव
*
नर ने चुने नरेश बन,  भूल गए कर्तव्य
इसीलिये धुँधला लगे, आज 'सलिल' भवितव्य
*
रुपये को पैसा कहें, मिट जाएगा कष्ट
नीति यही सरकार की, बढ़ता रहे अनिष्ट
*
मुफ्त बाँट सौ- कर बढ़ा, करें वसूल हजार
चतुर आई.ए.एस. हैं, सचिवालय-सरकार
*
मान न मोल करें तनिक, श्रम का- हम दुत्कार
फिर मजूर कोई बने, क्यों? सहने फटकार??
*
नाकाबिल इंजीनियर, गढ़ते हैं कोलेज
श्रेष्ठ बढ़ई-मिस्त्री बनें, कोई न दे नोलेज
*
रहे भीख पर आश्रित, मतदाता- दे वोट
शासन के अनुदान के, पीछे भारी खोट
*
रोजगार पाकर गहे, शक्ति न लोक-समाज
नेतागण चाहें यही, करें निबल पर राज
*
देश नहीं दीवालिया,  धन ले गये विदेश
वापिस लाने के लिये, जनगण दे आदेश
*
सेना महज गुलाम है, मंत्रालय का दोष
मंत्री-सचिवों का बढ़े, कमा कमीशन कोष
*
पिठ्ठू है सरकार यह, अमरीका की मीत
उसके हित की नीतियाँ, बना गा रही गीत
*
होता है निर्यात कम, बहुत अधिक आयात
मंत्री-अफसर कमीशन ले, करते आघात
*
उत्पादन करते महज, यंत्री  श्रमिक किसान
शिक्षक डॉक्टर जरूरी, ज्ञान-जान की खान
*
शांति-व्यवस्था के लिए, सेना पुलिस सहाय
न्यायालय का भी नहीं,  दूजा कोई उपाय
*
बाबू अफसर भृत्य का, कहीं न कोई काम
मिटें दलाल-वकील भी, कर श्रम पायें नाम
*
जिसका उत्पादन अधिक, उसे मिले ईनाम
अन उत्पादक से छिनें, सुविधा 'सलिल' तमाम
*
जन-प्रतिनिधि दलहीन हों, राष्ट्रीय सरकार
रहें समर्थक सदन में, जैसे घर-परिवार
*
सब मिल संचालन करें, बने राष्ट्र-हित नीति
देश स्वावलंबी बने, महाशक्ति तज भीति
*
नर नरेश बनकर करे, सतत राष्ट्र-निर्माण
'सलिल' तभी हो सकेगा हर संकट से त्राण
==============

बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

doha-gazal: basantee doha gazal -sanjiv

​
बासंती दोहा ग़ज़ल:
संजीव
*
स्वागत  में ऋतुराज के, पुष्पित हैं कचनार
किंशुक कुसुम दहक रहे, या दहके अंगार?
*
पर्ण-पर्ण पर छा गया, मादक रूप निखार
पवन खो रहा होश निज, लख वनश्री-श्रृंगार
*
महुआ महका देखकर, चहका-बहका प्यार
 मधुशाला में बिन पिये, सिर पर नशा सवार
*
नहीं निशाना चूकती, पञ्चशरों की मार
पनघट-पनघट हो रहा, इंगित का व्यापार
*
नैन मिले लड़ झुक उठे, करने को इंकार
देख नैन में बिम्ब निज, कर बैठे इकरार
*
मैं-तुम, यह-वह ही नहीं, बौराया संसार
सब पर बासंती नशा, मिल लें गले खुमार
*
ढोलक, टिमकी, मंजीरा, करें ठुमक इसरार
दुनियावी चिंता भुला, नाचो-झूमो यार
*
घर आँगन तन धो दिया, तन का रूप निखार
अंतर्मन का मेल भी, प्रियवर! कभी बुहार।
*
बासंती दोहा-गज़ल, मन्मथ की मनुहार
सीरत-सूरत रख 'सलिल', निर्मल सहज सँवार
*
facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil'

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

doha salila: naya saal -sanjiv

नये साल की दोहा सलिला:

संजीव'सलिल' 
*
उगते सूरज को सभी, करते सदा प्रणाम.
जाते को सब भूलते, जैसे सच बेदाम..
*
हम न काल के दास हैं, महाकाल के भक्त.
कभी समय पर क्यों चलें?, पानी अपना रक्त..
 *
बिन नागा सूरज उगे, सुबह- ढले हर शाम.
यत्न सतत करते रहें, बिना रुके निष्काम..
  *
अंतिम पल तक दिये से, तिमिर न पाता जीत. 
सफर साँस का इस तरह, पूर्ण करें हम मीत..
  *
संयम तज हम बजायें, व्यर्थ न अपने गाल.
बन संतोषी हों सुखी, रखकर उन्नत भाल..
  *
ढाई आखर पढ़ सुमिर, तज अद्वैत वर द्वैत.  
मैं-तुम मिट, हम ही बचे, जब-जब खेले बैत.. 
  *
जीते बाजी हारकर, कैसा हुआ कमाल.
'सलिल'-साधना सफल हो, सबकी अबकी साल..
*
भुला उसे जो है नहीं, जो है उसकी याद.
जीते की जय बोलकर, हो जा रे नाबाद..
*
नये साल खुशहाल रह, बिना प्याज-पेट्रोल..
मुट्ठी में समान ला, रुपये पसेरी तौल..
*
जो था भ्रष्टाचार वह, अब है शिष्टाचार.
नये साल के मूल्य नव, कर दें भव से पार..
*
भाई-भतीजावाद या, चचा-भतीजावाद. 
राजनीति ने ही करी, दोनों की ईजाद..
*
प्याज कटे औ' आँख में, आँसू आयें सहर्ष. 
प्रभु ऐसा भी दिन दिखा, 'सलिल' सुखद हो वर्ष..
*
जनसँख्या मंहगाई औ', भाव लगाये होड़. 
कब कैसे आगे बढ़े, कौन शेष को छोड़.. 
*
ओलम्पिक में हो अगर, लेन-देन का खेल. 
जीतें सारे पदक हम, सबको लगा नकेल..
*
पंडित-मुल्ला छोड़ते, मंदिर-मस्जिद-माँग.
कलमाडी बनवाएगा, मुर्गा देता बांग..
*
आम आदमी का कभी, हो किंचित उत्कर्ष.
तभी सार्थक हो सके, पिछला-अगला वर्ष..
*
गये साल पर साल पर, हाल रहे बेहाल.
कैसे जश्न मनायेगी. कुटिया कौन मजाल??
*
धनी अधिक धन पा रहा, निर्धन दिन-दिन दीन. 
यह अपने में लीन है, वह अपने में लीन..
****************

रविवार, 29 दिसंबर 2013

doha salila: sanjiv

दोहा सलिला:
पौधरोपण कीजिए
संजीव
*
पौधारोपण कीजिए, शुद्ध हो सके वायु
जीवन जियें निरोग सब, मानव हो दीर्घायु
*
एक-एक ग्यारह हुए, विहँसे बारह मास
तेरह पग चलकर हरें, 'सलिल' सभी संत्रास
*
मैं-तुम मिल जब हम हुए, मंज़िल मिली समीप
हों अनेक जब एक तो, तम हरते बन दीप
*
चेतन जब चैतन्य हो, तब होता संजीव
अंतर्मन शतदल सदृश, खिल होता राजीव
*
विजय-पराजय से रहे, जब अंतर्मन दूर
प्रभु-कीर्तन पल-पल करे, श्वासों का संतूर
*
जब तक रीतेगा नहीं, आकांक्षा का कोष
जब तक पायेगा नहीं, अंतर्मन संतोष
*
नित लाती है रवि-किरण, दिनकर का पैगाम
लाली आती उषा के, गालों पर सुन नाम
*
आशीषों की रोटरी, कोशिश की हो राह
वाह परिश्रम की करें, मन में पले न डाह
*
अंकुर पल्लव पौध ही, बढ़ बनते उद्यान
संरक्षण पा ओषजन, से दें जीवन दान
*

गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

doha salila: pani raha n aankh men -sanjiv

दोहा सलिला:
​पानी रहा न आँख में
संजीव
*
पानी रहा न आँख में, बाकी रहा न मान
पानी बहा न आँख तू, आँख तरेर सुजान
*
पानी-पानी हो गये, बिन पानी तालाब
पानी खोकर आँख का, मनुज हुआ बे-आब
*
पानी पर आँखें रखें, हो न प्रदूषित और
अमल विमल निर्मल 'सलिल', धरती का सिरमौर
*
सुमुखि! चैन हर ले गयीं, आँखें पानीदार
आँखों से आँखें मिलीं, डूबीं मिला न पार
*
बहता पानी आँख से, जब हो दिल में दर्द
घूर आँख देखें- जमे, खून शत्रु हो सर्द
*
Sanjiv verma 'Salil'
facebook: sahiyta salila / sanjiv verma '

aaj ki baat: sanjiv

आज की बात:
संजीव 
*
रजनी ने मानव को बख्शी, ख्वाबों की जागीर
हो संजीव उषा हँस बोली, सलिल करो तामीर
*
हर चेहरा ईश्वर का चेहरा, कण-कण में भगवान
हर कंकर में मिलता शंकर, देखे तो इंसान
*
बे-ईमान में भी है ईमान देखिये
हैं बा-ईमान आप से कुछ यह भी लेखिये
अफसर हैं हम भी घर में बोल दे अगर बीबी
चाकर हुए तो क्या हुआ पाई है करीबी
*******
Sanjiv verma 'Salil'
salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.in

गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

doha kahe muhavara: sanjiv

दोहा सलिला:
दोहा कहे मुहावरा...
संजीव 'सलिल'
*
दोहा कहे मुहावरा, सुन-गुन समझो मीत.
कम कहिये समझें अधिक, जन-जीवन की रीत.१.
*
दोहा संग मुहावरा, दे अभिनव आनंद.
'गूंगे का गुड़' जानिए, पढ़िये-गुनिये छंद.२.
*
हैं वाक्यांश मुहावरे, जिनका अमित प्रभाव.
'सिर धुनते' हैं नासमझ, समझ न पाते भाव.३.
*
'पत्थर पड़ना अकल पर', आज हुआ चरितार्थ.
प्रतिनिधि जन को छल रहे, भुला रहे फलितार्थ.४.
*
'अंधे की लाठी' सलिल, हैं मजदूर-किसान.
जिनके श्रम से हो सका भारत देश महान.५.
*
कवि-कविता ही बन सके, 'अंधियारे में ज्योत'
आपद बेला में सकें, साहस-हिम्मत न्योत.६.
*
राजनीति में 'अकल का, चकराना' है आम.
दक्षिण के सुर में 'सलिल', बोल रहा है वाम.७.
*
'अलग-अलग खिचडी पका', हारे दिग्गज वीर.
बतलाता इतिहास सच, समझ सकें मतिधीर.८.
*
जो संसद में बैठकर, 'उगल रहा अंगार'
वह बीबी से कह रहा, माफ़ करो सरकार.९.
*
लोकपाल के नाम पर, 'अगर-मगर कर मौन'.
सारे नेता हो गए, आगे आए कौन?१०?
*
'अंग-अंग ढीला हुआ', तनिक न फिर भी चैन.
प्रिय-दर्शन पाये बिना आकुल-व्याकुल नैन.११.
*
'अपना उल्लू कर रहे, सीधा' नेता आज.
दें आश्वासन झूठ नित, तनिक न आती लाज.12.
*
'पानी-पानी हो गये', साहस बल मति धीर.
जब संयम के पल हुए, पानी की प्राचीर.13.
*
चीन्ह-चीन्ह कर दे रहे, नित अपनों को लाभ.
धृतराष्ट्री नेता हुए, इसीलिये निर-आभ.14.
*
पंथ वाद दल भूलकर, साध रहे निज स्वार्थ.
संसद में बगुला भगत, तज जनहित-परमार्थ.15.
*
छुरा पीठ में भौंकना, नेता जी का शौक.
लोकतंत्र का श्वान क्यों, काट न लेता भौंक?16.
*
राजनीति में संत भी, बदल रहे हैं रंग.
मैली नाले सँग हुई, जैसे पावन गंग.17.
*
दरिया दिल हैं बात के, लेकिन दिल के तंग.
पशोपेश उनको कहें, हम अनंग या नंग?18.
*
मिला हाथ से हाथ वे, चला रहे सरकार.
भुला-भुना आदर्श को, पाल रहे सहकार.19.
*
लिये हाथ में हाथ हैं, खरहा शेर सियार.
मिलते गले चुनाव में, कल झगड़ेंगे यार.20.
*
गाल बजाते फिर रहे, गली-गली सरकार.
गाल फुलाये जो उन्हें, करें नमन सौ बार.21.
*
राम नाप जपते रहे,गैरों का खा माल.
राम नाम सत राम बिन, करते राम कमाल.22.
* 
'राम भरोसे' हो रहे, पूज्य निरक्षर संत.
'मुँह में राम बगल लिये, छुरियाँ' मिले महंत.२३.
*
'नाच न जानें' कह रहे, 'आंगन टेढ़ा' लोग.
'सच से आँखें मूंदकर', 'सलिल' न मिटता रोग.२४.
*
'दिन दूना'और 'रात को, चौगुन' कर व्यापार.
कंगाली दिखला रहे, स्याने साहूकार.२५.
*
'साढ़े साती लग गये', चल शिंगनापुर धाम.
'पैरों का चक्कर' मिटे, दुःख हो दूर तमाम.२६.
*
'तार-तार कर' रहे हैं, लोकतंत्र का चीर.
लोभतंत्र ने रच दिया, शोकतंत्र दे पीर.२७.
*
'बात बनाना' ही रहा, नेताओं का काम.
'बात करें बेबात' ही, संसद सत्र तमाम.२८.
*
'गोल-मोल बातें करें', 'करते टालमटोल'.
असफलता को सफलता, कहकर 'पीटें ढोल'.२९.
*
'नौ दिन' चलकर भी नहीं, 'चले अढ़ाई कोस'.
किया परिश्रम स्वल्प पर, रहे 'भाग्य को कोस'.३०.
*

मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

doha salila: sanjiv

​दोहा सलिला:
अभिकल्पन रूपांकन, संरचना का मूल
गुणवत्ता निर्माण का, प्राण न जाएँ भूल
*
रेखांकन ही तय करे, रूप-माप-आकार
सजक पर्यवेक्षण अगर, सपना हो साकार
*
सूक्ष्म गौड़ बारीकियाँ, अधिक चाहतीं ध्यान
बाधाओं का कीजिये, 'सलिल' पूर्व अनुमान
*
अनसोची कठिनाई का, करे सामना धैर्य
समाधान सम्यक मिले, रचें सृष्टि निर्वेर्य
*
ब्रम्हा-हरि-शिव पुजे कर, रचना-पालन-नाश
अभियंता यह सब करे, जग सच माने काश
*
धरती के नव तीर्थ हैं, 'सलिल' नये निर्माण
अभियंता नित फूँकते, पत्थर में भी प्राण
*
दृढ़ संरचना प्रमुख है, सज्जा मानें गौड़
होड़ न स्पर्धा करें, व्यर्थ न चलिये दौड़
*
शशि-मंगल-सागर रहे, अभियंतागण नाप
सृष्टि-स्रजन के राज भी, चाह रहे लें माप
*
कल से कल को जोड़ते, अभियंता ही आज
कूल-किनारे एक कर, क्या जाने किस व्याज?
*
कल दे कल की चाह में, तोड़ें बाधा-पाश
दिग्दिगंत सँग नापते, अभियंता आकाश
*
सामाजिक अभियांत्रिकी, समरस रचे समाज
मिटे अंध-श्रद्धा 'सलिल', शांति कर सके राज
*
सॉफ्टवेयर अभियांत्रिकी, है युग की पहचान
करे कठिन को सरल यह, देकर 'सलिल' निदान
*
सूक्ष्म काल-गणना करे, ज्योतिष वर्षों-वर्ष
पुष्टि करे विज्ञान भी, भारत का उत्कर्ष
*
समझ वेद-विज्ञान को, पश्चिम उन्नत आज
पिछड़ गये हम पूजकर, 'सलिल' हुआ सच-राज
*
भारत की खोजें हुईं, क्यों पश्चिम के नाम?
रचें नया इतिहास हम, खोजें सत्य तमाम
*
जगवाणी हिंदी करे, अंतरिक्ष में घोष
नहीं हिन्द में मान है, क्यों-किसका है दोष?
*
सुर-वाणी है संस्कृत, जनवाणी हैं अन्य
जगवाणी हिंदी 'सलिल', सचमुच दिव्य अनन्य
*
अंग्रेजी लिपिहीन है, ली रोमन से भीख
दंभ श्रेष्ठता का करे, दे अन्यों को सीख
*
हिंदी वर्णोच्चार है, ध्वनियों के अनुसार
जो बोलें वह लिख-पढ़, रीति-नीति व्यवहार*

doha salila: sanjiv

​
​​दोहा सलिला :
संजीव
*
जन्म ब्याह राखी तिलक, गृह-प्रवेश त्यौहार
हर अवसर पर दें 'सलिल', पुस्तक ही उपहार
*
हिंदी आटा माढ़िये, उर्दू मोयन डाल
'सलिल' संस्कृत सान दे, पूड़ी बने कमाल
*
नेह नर्मदा नीर में, अवगाहन कर आप
दिल को दिल से जोड़िये, सकें विश्व में व्याप
*
दिन कर दिनकर ने दिया, जाग-उठो सन्देश
सुना अनसुना कर दिया, निशिचर ने आदेश
*
संध्या-वंदन कर रहा, आँखें मिला दिनेश
ननद निशा ने रूठकर, असमय किया प्रवेश
*
महावीर ने हार दिल, पहनाया भुज-हार
हुई विनीता गर्विता, कर सोलह सिंगार
*
निशानाथ-दिनपति मिले, भू-नभ देखें दंग
सुलह हुई या छिड़ेगा, अब दोनों में जंग
*
दुख का प्रबल प्रभाव है, सुख का निपट अभाव
सरल स्वाभाव करे 'सलिल', सबसे विहँस निभाव
*
   

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मंगलवार, 17 सितंबर 2013

yamakeey doha salila : sanjiv

:दोहा सलिला :
गले मिले दोहा-यमक
संजीव
*
चंद चंद तारों सहित, करे मौन गुणगान
रजनी के सौंदर्य का, जब तक हो न विहान
*
जहाँ पनाह मिले वहीं, बस बन जहाँपनाह
स्नेह-सलिल का आचमन, देता शांति अथाह
*
स्वर मधु बाला चन्द्र सा, नेह नर्मदा-हास
मधुबाला बिन चित्रपट, है श्रीहीन उदास
*
स्वर-सरगम की लता का,प्रमुदित कुसुम अमोल
खान मधुरता की लता, कौन सके यश तौल
*
भेज-पाया, खा-हँसा, है प्रियतम सन्देश
सफलकाम प्रियतमा ने, हुलस गहा सन्देश
*
गुमसुम थे परदेश में, चहक रहे आ देश
अब तक पाते ही रहे, अब देते आदेश
*
पीर पीर सह कर रहा, धीरज का विनिवेश
घटे न पूँजी क्षमा की, रखता ध्यान विशेष
*
माया-ममता रूप धर, मोह मोहता खूब
माया-ममता सियासत, करे स्वार्थ में डूब
*
जी वन में जाने तभी, तू जीवन का मोल
घर में जी लेते सभी, बोल न ऊँचे बोल
*
विक्रम जब गाने लगा, बिसरा लय बेताल
काँधे से उतरा तुरत, भाग गया बेताल
*