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शनिवार, 17 मई 2014

chitr-chitr kavita: -sanjiv

चित्र-चित्र कविता:
संजीव
 *

फ़ोटो: Thanks for the add me.

मेरे मन में कौन बताये कितना दिव्य प्रकाश है?
नयन मूँदकर जब-जब देखा, ज्योति भरा आकाश है.
चित्र गुप्त साकार दिखे शत, कण-कण ज्योतित दीप दिखा-
गत-आगत के गहन तिमिरमें, सत-शिव-सुंदर आज दिपा।
*


हार गया तो क्या गम? मन को शांत रखूँ
जीत चख चुका, अब थोड़ी सी हार चखूँ
फूल-शूल जो जब पाऊँ, स्वीकार सकूँ
प्यास बुझाकर भावी 'सलिल' निहार सकूँ
*


भटका दिन भर थक गया, अब न भा रही भीड़
साँझ कहे अब लौट चल, राह हेरता नीड़
*


समय की बहती नदी पर, रक्त के हस्ताक्षर
किये जिसने कह रहा है, हाय खुद को साक्षर
ढाई आखर पढ़ न पाया, स्याह कर दी प्रकृति ही-
नभ धरा तरु नेह से, रहते न कहना निरक्षर

*

(निलं मिश्रा जी)
खों रहे क्या कुछ भविष्य में, जो चाहेंगे पा जायेंगे
नेह नर्मदा नयन तुम्हारे, जीवन -जय गायेंगे
*  


(शानू)
दीखता है साफ़-साफ़, समय नहीं करे माफ़
जो जैसा स्वीकारूँ, धूप-छाँव हाफ़-हाफ़
गिर-उठ-चल मुस्काऊँ, कुछ नवीन रच जाऊँ-
समय हँसे देख-देख, अधरों पर मधुर लाफ.
*

(रघुविंदर यादव)
लाख आवरण ओढ़ रहे हो, मैं नज़रों से देख पा रहा
क्या-क्या मन में भाव छिपाये?, कितना तुमको कौन भा रहा?
पतझर काँटे धूल साथ ले, सावन-फागुन की अगवानी-
करता रहा मौन रहकर नित, गीत बाँटकर प्रीत पा रहा.
*

(सिया कुमार)
मौन भले दिखता पर मौन नहीं होता मन.
तन सीमित मन असीम, नित सपने बोता मन.
बेमन स्वीकार या नकार नहीं भाता पर-
सच है खुद अपना ही सदा नहीं होता मन.
*
वोट चोट करता 'सलिल', देख-देखकर खोट
जो कल थे इतरा रहे, आज रहे हैं लोट
जिस कर ने पायी ध्वजा, सम्हल बढ़ाये पैर
नहीं किसी का सगा हो, समय न करता बैर
*

*इंदु सिंह(
तेरे नयनों की रामायण, बाँच रही मैं रहकर मौन
मेरे नयनों की गीता को, पढ़ पायेगा बोलो कौन?
नियति न खुलकर सम्मुख आती, नहीं सदा अज्ञात रहे-
हो सामर्थ्य नयन में झाँके बिना नयन कुछ बात कहे.

गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

chitr par kavita -sanjiv

​चित्र पर कविता
संजीव
*


भगा साथियों को दिया, किन्तु न भागा आप
मधुर-मधुर मुस्कान से, हर मैया का ताप
कान खिंचा मुस्का रहा, ब्रिज का माखनचोर
मैया भूली डाँटना, होकर भाव विभोर
*
अग्निहोत्र नभ ने किया, साक्षी देते मेघ
मिलीं लालिमा-कालिमा, गले भूलकर भेद
आया आम चुनाव क्या?, केर-बेर का संग
नित नव गठबंधन करे, खिले नये गुल-रंग
*
फेरे सात लगा लिये, कदम-कदम रख साथ
कर आये मतदान भी, लिए हाथ में हाथ
करते हैं संकल्प यह, जब भी हों मतभेद
साथ बैठ सुलझाएँगे, 'सलिल' न हो मनभेद
*



मुस्कुराती रहो, खिलखिलाती रहो,
पंछियों की तरह गीत गाती रहो
जो तुम्हें भा रहा, है दुआ यह मेरी-
तुम भी उसको सदा खूब भाती रहो
*
facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil'

गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

CHITRA PAR KAVITA: SANJIV

चित्र पर कविता:
संजीव
*

बैल!
तुम सभ्य तो हुए नहीं,
मनुज बनना तुम्हें नहीं भाया।
एक बात पूछूँ?, उत्तर दोगे??
लड़ना कहाँ से सीखा?
भागना कहाँ से आया??
***
(स्व. अज्ञेय जी से क्षमा प्रार्थना सहित)

मंगलवार, 25 मार्च 2014

samyik kavita: kare faisla kaun? -sanjiv

सामयिक रचना :
करे फैसला कौन?
संजीव
*
 

मन का भाव बुनावट में निखरा कढ़कर है
जो भीतर से जगा,  कौन उससे बढ़कर है?
करे फैसला कौन?, कौन किससे बढ़कर है??
* 
जगा जगा दुनिया को हारे खुद सोते ही रहे
गीत नर्मदा के गाये पर खुद ही नहीं बहे
अकथ कहानी चाह-आह की किससे कौन कहे
कर्म चदरिया बुने कबीरा गुपचुप बिना तहे
निज नज़रों में हर कोई सबसे चढ़कर है

जो भीतर से जगा,  कौन उससे बढ़कर ह
करे फैसला कौन?, कौन किससे बढ़कर है??
*
निर्माता-निर्देशक भौंचक कितनी पीर सहे
पात्र पटकथा लिख मनमानी अपने हाथ गहे
मण्डी में मंदी, मानक के पल में मूल्य ढहे
सोच रहा निष्पक्ष भाव जो अपनी आग दहे
माटी माटी से माटी आयी गढ़कर है

जो भीतर से जगा,  कौन उससे बढ़कर है?
करे फैसला कौन?, कौन किससे बढ़कर है??
*

बुधवार, 15 जनवरी 2014

kavya salila: cheeta -salil

कविता:
चीता
संजीव
*
कौन कहता है कि
चीता मर गया है?
हिंस्र वृत्ति
जहाँ देखो बढ़ रही है.
धूर्तता
किस्से नये
नित गढ़ रही है.
शक्ति के नाखून पैने
चोट असहायों पर करते
स्वाद लेकर रक्त पीते
मारकर औरों को जीते
और तुम?
और तुम कहते हो
चीता मर गया है.
नहीं,
वह तो
आदमी की
नस्ल में घर कर गया है.
झूठ कहते हो कि
चीता मर गया है.
=============

गुरुवार, 9 जनवरी 2014

kavita: geedh -sanjiv

काव्य सलिला:
गीध
संजीव
*
जब स्वार्थ-साधन,
लोभ-लालच,
सत्ता और सुविधा तक
सीमित रह जाए
नाक की सीध
तब समझ लो आदमी
इंसान नहीं रह गया
बन गया है गीध.

***