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मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

janak chhandi salila: sanjiv

जनक छंदी सलिला: २                                                                         

संजीव 'सलिल'
*
शुभ क्रिसमस शुभ साल हो,
   मानव इंसां बन सके.
      सकल धरा खुश हाल हो..
*
दसों दिशा में हर्ष हो,
   प्रभु से इतनी प्रार्थना-
       सबका नव उत्कर्ष हो..
*
द्वार ह्रदय के खोल दें,
   बोल क्षमा के बोल दें.
      मधुर प्रेम-रस घोल दें..
*
तन से पहले मन मिले,
   भुला सभी शिकवे-गिले.
      जीवन में मधुवन खिले..
*
कौन किसी का हैं यहाँ?
   सब मतलब के मीत हैं.
      नाम इसी का है जहाँ..
*
लोकतंत्र नीलाम कर,
   देश बेचकर खा गये.
      थू नेता के नाम पर..
*
सबका सबसे हो भला,
   सभी सदा निर्भय रहें.
      हर मन हो शतदल खिला..
*
सत-शिव सुन्दर है जगत,
   सत-चित -आनंद ईश्वर.
      हर आत्मा में है प्रगट..
*
सबको सबसे प्यार हो,
  अहित किसी का मत करें.
     स्नेह भरा संसार हो..
*
वही सिंधु है, बिंदु भी,
   वह असीम-निस्सीम भी.
      वही सूर्य है, इंदु भी..
*
जन प्रतिनिधि का आचरण,
   जन की चिंता का विषय.
      लोकतंत्र का है मरण..
*
शासन दुश्शासन हुआ,
   जनमत अनदेखा करे.
      कब सुधरेगा यह मुआ?
*
सांसद रिश्वत ले रहे,
   क़ैद कैमरे में हुए.
      ईमां बेचे दे रहे..
*
सबल निबल को काटता,
   कुर्बानी कहता उसे.
      शीश न निज क्यों काटता?
*
जीना भी मुश्किल किया,
   गगन चूमते भाव ने.
      काँप रहा है हर जिया..
*

navgeet: mahakal ke... sanjiv

नव वर्ष पर नवगीत: 

महाकाल के महाग्रंथ का --

संजीव 'सलिल'

*
महाकाल के महाग्रंथ का

नया पृष्ठ फिर आज खुल रहा....

*
वह काटोगे,

जो बोया है.

वह पाओगे,

जो खोया है.

सत्य-असत, शुभ-अशुभ तुला पर

कर्म-मर्म सब आज तुल रहा....
*
खुद अपना

मूल्यांकन कर लो.

निज मन का

छायांकन कर लो.

तम-उजास को जोड़ सके जो

कहीं बनाया कोई पुल रहा?...

*
तुमने कितने

बाग़ लगाये?

श्रम-सीकर

कब-कहाँ बहाए?

स्नेह-सलिल कब सींचा?

बगिया में आभारी कौन गुल रहा?...

*

स्नेह-साधना करी

'सलिल' कब.

दीन-हीन में

दिखे कभी रब?

चित्रगुप्त की कर्म-तुला पर

खरा कौन सा कर्म तुल रहा?...

*
खाली हाथ?

न रो-पछताओ.

कंकर से

शंकर बन जाओ.

ज़हर पियो, हँस अमृत बाँटो.

देखोगे मन मलिन धुल रहा...

**********************

doha salila: naya saal -sanjiv

नये साल की दोहा सलिला:

संजीव'सलिल' 
*
उगते सूरज को सभी, करते सदा प्रणाम.
जाते को सब भूलते, जैसे सच बेदाम..
*
हम न काल के दास हैं, महाकाल के भक्त.
कभी समय पर क्यों चलें?, पानी अपना रक्त..
 *
बिन नागा सूरज उगे, सुबह- ढले हर शाम.
यत्न सतत करते रहें, बिना रुके निष्काम..
  *
अंतिम पल तक दिये से, तिमिर न पाता जीत. 
सफर साँस का इस तरह, पूर्ण करें हम मीत..
  *
संयम तज हम बजायें, व्यर्थ न अपने गाल.
बन संतोषी हों सुखी, रखकर उन्नत भाल..
  *
ढाई आखर पढ़ सुमिर, तज अद्वैत वर द्वैत.  
मैं-तुम मिट, हम ही बचे, जब-जब खेले बैत.. 
  *
जीते बाजी हारकर, कैसा हुआ कमाल.
'सलिल'-साधना सफल हो, सबकी अबकी साल..
*
भुला उसे जो है नहीं, जो है उसकी याद.
जीते की जय बोलकर, हो जा रे नाबाद..
*
नये साल खुशहाल रह, बिना प्याज-पेट्रोल..
मुट्ठी में समान ला, रुपये पसेरी तौल..
*
जो था भ्रष्टाचार वह, अब है शिष्टाचार.
नये साल के मूल्य नव, कर दें भव से पार..
*
भाई-भतीजावाद या, चचा-भतीजावाद. 
राजनीति ने ही करी, दोनों की ईजाद..
*
प्याज कटे औ' आँख में, आँसू आयें सहर्ष. 
प्रभु ऐसा भी दिन दिखा, 'सलिल' सुखद हो वर्ष..
*
जनसँख्या मंहगाई औ', भाव लगाये होड़. 
कब कैसे आगे बढ़े, कौन शेष को छोड़.. 
*
ओलम्पिक में हो अगर, लेन-देन का खेल. 
जीतें सारे पदक हम, सबको लगा नकेल..
*
पंडित-मुल्ला छोड़ते, मंदिर-मस्जिद-माँग.
कलमाडी बनवाएगा, मुर्गा देता बांग..
*
आम आदमी का कभी, हो किंचित उत्कर्ष.
तभी सार्थक हो सके, पिछला-अगला वर्ष..
*
गये साल पर साल पर, हाल रहे बेहाल.
कैसे जश्न मनायेगी. कुटिया कौन मजाल??
*
धनी अधिक धन पा रहा, निर्धन दिन-दिन दीन. 
यह अपने में लीन है, वह अपने में लीन..
****************

geet: ab to apna bhal utha -sanjiv

नवगीत: 

अब तो अपना भाल उठा... 

संजीव 'सलिल'

*
बहुत झुकाया अब तक तूने 
अब तो अपना भाल उठा...
*
समय श्रमिक!
मत थकना-रुकना.
बाधा के सम्मुख
मत झुकना.
जब तक मंजिल
कदम न चूमे-
माँ की सौं
तब तक
मत चुकना.

अनदेखी करदे छालों की
गेंती और कुदाल उठा...
*
काल किसान!
आस की फसलें.
बोने खातिर
एड़ी घिस ले.
खरपतवार 
सियासत भू में-
जमी- उखाड़
न न मन-बल फिसले.
पूँछ दबा शासक-व्यालों की
पोंछ पसीना भाल उठा...
*
ओ रे वारिस
नए बरस के.
कोशिश कर
क्यों घुटे तरस के?
भाषा-भूषा भुला
न अपनी-
गा बम्बुलिया
उछल हरष के.
प्रथा मिटा साकी-प्यालों की
बजा मंजीरा ताल उठा...
*

geet: naya varsh hai -sanjiv

नया वर्ष है...
संजीव 'सलिल'
*
खड़ा मोड़ पर आकर फिर इक नया वर्ष है।
पहलू में निज किये समाहित शोक-हर्ष है।।

करें नमस्ते, हाथ मिलाएं, टा-टा कह दें।
गत को कर दें विदा, गलत को कभी न शह दें।।
आगत स्वागत श्रम-संयम-सहकार सीख ले-
काल कह रहा: 'रे इंसां! आइना देख ले।।'
स्वार्थ-जिद्द के आगे बेबस क्यों विमर्श है?
खड़ा मोड़ पर आकर फिर इक नया वर्ष है...

शुभ की लेकर आड़ अशुभ क्यों पली भावना?
भोग प्रबल क्यों हुआ, सबल अनकही कामना??
उत्तर देगा कौन?, कहाँ-किसकी गलती है?
उतर सड़क पर कर में पत्थर थाम मारना।
वर्षों में निर्माण, नाश पल में, अमर्ष है।  
खड़ा मोड़ पर आकर फिर इक नया वर्ष है...

बना लिया बाज़ार देश तज संस्कार सब। 
अनाचार को देख याद क्यों अब आता रब?
धन-सुविधा ने मोहा, त्यागा निज माटी को-
'रूखी खा संतोष करें'- निज परिपाटी को।।
सज्जन है असहाय, करे दुर्जन कु-कर्ष है।
खड़ा मोड़ पर आकर फिर इक नया वर्ष है...
*
कर्ष = झुकाना, जोतना, खींचना
Acharya Sanjiv verma 'Salil'
http://divyanarmada.blogspot.com

geet; naya varsh hai -sanjiv

IMG_6224.JPG 

गीत: नया वर्ष है...
खड़ा मोड़ पर आकर फिर
एक नया वर्ष है...

कल से कल का सेतु आज है यह मत भूलो|
पाँव जमीं पर जमा, आसमां को भी छू लो..

मंगल पर जाने के पहले
भू का मंगल -
कर पायें कुछ तभी कहें
पग तले अर्श है|
खड़ा मोड़ पर आकर फिर
एक नया वर्ष है...

आँसू न बहा, दिल जलता है, चुप रह, जलने दे|
नयन उनीन्दें हैं तो क्या, सपने पलने दे..

संसद में नूराकुश्ती से
क्या पाओगे?
सार्थक तब जब आम आदमी
कहे हर्ष है|
खड़ा मोड़ पर आकर फिर
एक नया वर्ष है...

गगनविहारी माया की ममता पाले है|
अफसर, नेता, सेठ कर रहे घोटाले हैं|

दोष बताएं औरों के
निज दोष छिपाकर-
शीर्षासन कर न्याय कहे
सिर धरा फर्श है|
खड़ा मोड़ पर आकर फिर
एक नया वर्ष है...

धनी और निर्धन दोनों अधनंगे फिरते|
मध्यमवर्गी वर्जनाएं रच ढोते-फिरते..

मनमानी व्याख्या सत्यों
की करे पुरोहित-
फतवे जारी हुए न लेकिन
कुछ विमर्श है|
खड़ा मोड़ पर आकर फिर
एक नया वर्ष है...

चले अहर्निश ऊग-डूब कब सोचे सूरज?
कर कर कोशिश फल की चिंता काश सकें तज..

कंकर से शंकर गढ़ना हो
लक्ष्य हमारा-
विषपायी हो 'सलिल'
कहें: त्याग अमर्श है|
खड़ा मोड़ पर आकर फिर
एक नया वर्ष है...

*

कर्ष = झुकाना, जोतना, खींचना
Acharya Sanjiv verma 'Salil'
http://divyanarmada.blogspot.com

geet; naye varsh men -sanjiv

गीत:
झाँक रही है...
संजीव 'सलिल'
*
झाँक रही है
खोल झरोखा
नए वर्ष में धूप सुबह की...
*
चुन-चुन करती चिड़ियों के संग
कमरे में आ.
बिन बोले बोले मुझसे
उठ! गीत गुनगुना.
सपने देखे बहुत, करे
साकार न क्यों तू?
मुश्किल से मत डर, ले
उनको बना झुनझुना.

आँक रही
अल्पना कल्पना
नए वर्ष में धूप सुबह की...
*
कॉफ़ी का प्याला थामे
अखबार आज का.
अधिक मूल से मोह पीला
क्यों कहो ब्याज का?
लिए बांह में बांह
डाह तज, छह पल रही-
कशिश न कोशिश की कम हो
है सबक आज का.

टाँक रही है
अपने सपने
नए वर्ष में धूप सुबह की...
*

सोमवार, 30 दिसंबर 2013

kavita: naya saal -sarveshwar dayal saxena

विरासत:
नए साल की शुभकामनाएँ!

https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgEUr_Ug7ly_aGJ5NAXNUsT3veofuBgBnyVjJ39diPp_gJIy8xxg3taMiyp-TFxTDC_HxIHn7VKGrUrJiivYPaAzSgcGYEClZNZADcUWGRt3y40LHK4gAFBMR7_kk7Ub7_o4KvXunVumRA/s1600/sarveshwar_dayal_saxena.jpg

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
*
 नए साल की शुभकामनाएँ! खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पाँव को कुहरे में लिपटे उस छोटे से गाँव को नए साल की शुभकामनाएं! 
जाँते के गीतों को बैलों की चाल को
करघे को कोल्हू को मछुओं के जाल को
नए साल की शुभकामनाएँ!

इस पकती रोटी को बच्चों के शोर को
चौंके की गुनगुन को चूल्हे की भोर को
नए साल की शुभकामनाएँ!

वीराने जंगल को तारों को रात को
ठंडी दो बंदूकों में घर की बात को
नए साल की शुभकामनाएँ!

इस चलती आँधी में हर बिखरे बाल को
सिगरेट की लाशों पर फूलों से ख़याल को
नए साल की शुभकामनाएँ!

कोट के गुलाब और जूड़े के फूल को
हर नन्ही याद को हर छोटी भूल को
नए साल की शुभकामनाएँ!

उनको जिनने चुन-चुनकर ग्रीटिंग कार्ड लिखे
उनको जो अपने गमले में चुपचाप दिखे
नए साल की शुभकामनाएँ!
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